लखनऊ, 7 मार्च (RNN) : अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की पूर्व संध्या पर “शक्ति अपनी पूर्णकला में स्फुरित” विषय पर तृतीय वैश्विक विदुषी सम्मेलन का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम अंतरराष्ट्रीय संस्कृत ग्लोबल फोरम तथा नवयुग कन्या महाविद्यालय, नेताजी सुभाष चंद्र बोस राजकीय महाविद्यालय, नारी निकेतन महाविद्यालय और महिला महाविद्यालय डिग्री कॉलेज, लखनऊ के संयुक्त तत्वावधान में लखनऊ विश्वविद्यालय के मालवीय सभागार में आयोजित हुआ।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन और मां सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण के साथ हुआ। अतिथियों का स्वागत अंगवस्त्र और स्मृति चिन्ह भेंट कर किया गया। इस अवसर पर पांच संपादकीय पुस्तकों का भी विमोचन किया गया।
सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय, बीकानेर (राजस्थान) के कुलपति प्रोफेसर मनोज दीक्षित उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफेसर हरिदत्त शर्मा ने की।
मंच पर विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रोफेसर रचना दूबे (वाराणसी), माता सुंदरी महाविद्यालय, दिल्ली की प्राचार्या प्रोफेसर हरप्रीत कौर, नेताजी सुभाष चंद्र बोस राजकीय महाविद्यालय की प्राचार्या प्रोफेसर रश्मि विश्नोई, विद्यांत हिंदू पीजी कॉलेज की प्राचार्या प्रोफेसर धर्म कौर तथा संस्कृत एवं प्राकृत भाषा विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय के अध्यक्ष डॉ. अभिमन्यु सिंह उपस्थित रहे।
कार्यक्रम में प्रोफेसर मनु शर्मा ने बीज वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए कहा कि नारी का चित्रण भारतीय चिंतन में सर्वत्र व्याप्त है। दार्शनिक और आध्यात्मिक परंपरा में शक्ति को एक ऐसी ऊर्जा के रूप में देखा गया है, जो समस्त सृष्टि और ज्ञान परंपरा में विद्यमान है। उन्होंने कहा कि आज हर क्षेत्र में नारी शक्ति अपनी पूर्ण क्षमता के साथ प्रकट हो रही है।

मुख्य अतिथि प्रोफेसर मनोज दीक्षित ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय संस्कृति और मूल्यों की स्थापना में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। उन्होंने कहा कि हमें यह समझना होगा कि अंग्रेजों के आगमन से पहले भारत आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से अत्यंत सुदृढ़ था। उन्होंने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के दर्शन का उल्लेख करते हुए कहा कि व्यक्ति से समष्टि तक की यात्रा में परिवार की भूमिका महत्वपूर्ण होती है और इस संदर्भ में मातृशक्ति का जागरण अत्यंत आवश्यक है।
ग्लोबल संस्कृत फोरम के राष्ट्रीय सचिव डॉ. राजेश मिश्र ने देश के विभिन्न राज्यों और जिलों से आई 20 विदुषी महिलाओं को विभिन्न ऋषिकाओं के नाम पर स्मृति सम्मान पत्र प्रदान कर सम्मानित किया।
अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रोफेसर हरिदत्त शर्मा ने कहा कि प्राचीन भारत में महिलाएं अत्यंत सशक्त थीं और वे अपने पतियों के साथ युद्ध में भी जाती थीं। उन्होंने बताया कि ऋग्वेद में नववधू को गृह प्रवेश के समय ‘साम्राज्ञी’ कहा जाता था, जो नारी के सम्मान और शक्ति का प्रतीक है। उद्घाटन सत्र का संचालन डॉ. उमा सिंह ने किया।
उद्घाटन सत्र के बाद दर्शनशास्त्र विभाग और मालवीय सभागार में चार समानांतर सत्र आयोजित किए गए, जिनमें लगभग 50 शोध पत्रों का वाचन हुआ। उत्तर प्रदेश संस्कृति विभाग के सहयोग से सांस्कृतिक संध्या का भी आयोजन किया गया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ।
इस अवसर पर आयोजन समिति के सदस्य, विभिन्न महाविद्यालयों के प्रवक्ता, शोधार्थी और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
