धरती की जीवनदायिनी क्षमताओं की रक्षा जरूरी

भारत डोगरा….

वैसे तो वैकल्पिक विकास की जरूरत बहुत समय से महसूस की गई है, पर आज की विशेष परिस्थितियों में इसका महत्व और बढ़ गया है।
हाल के वर्षों में, विशेषकर पिछले तीन दशकों में, इस सोच का संभवतरू सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह रहा है कि अब धरती पर जीवन के अस्तित्व मात्र का संकट विकट हो रहा है और इस कारण विकल्पों की तलाश और भी बहुत जरूरी हो गई है। हालांकि एक तरह से यह सोच 75 वर्ष पहले ही आरंभ हो गई थी जब पहला परमाणु बम हिरोशिमा में गिराया गया था। इसके बाद अस्तित्व का खतरा परमाणु हथियारों के संदर्भ में ही चर्चित होता था। पर जैसे-जैसे पर्यावरण की अनेक गंभीर समस्याओं व विशेषकर जलवायु बदलाव के संकट की गंभीरता स्पष्ट हुई तो अस्तित्व के संकट को अधिक व्यापक संदर्भ में पहचाना जाने लगा। इस संकट की व्यापकता और गंभीरता वर्ष 1990 तक स्पष्ट हो चुकी थी।

वर्ष 1992 में विश्व के 1575 वैज्ञानिकों ने (जिनमें उस समय जीवित नोबल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिकों में से लगभग आधे वैज्ञानिक भी सम्मिलित थे) एक बयान जारी किया, जिसमें उन्होंने कहा, हम मानवता को इस बारे में चेतावनी देना चाहते हैं कि भविष्य में क्या हो सकता है? पृथ्वी और उसके जीवन की व्यवस्था जिस तरह हो रही है उसमें एक व्यापक बदलाव की जरूरत है अन्यथा बहुत दुख-दर्द बढ़ेंगे और हम सबका घर यह पृथ्वी इतनी बुरी तरह तहस-नहस हो जाएगी कि फिर उसे बचाया नहीं जा सकेगा। आगे इन वैज्ञानिकों ने कहा कि वायुमंडल, समुद्र, मिट्टी, वन और जीवन के विभिन्न रूपों सभी पर तबाह हो रहे पर्यावरण का बहुत दबाव पड़ रहा है और वर्ष 2100 तक पृथ्वी के विभिन्न जीवन रूपों में से एक तिहाई लुप्त हो सकते हैं। मनुष्य की वर्त्तमान जीवन-पद्धति के अनेक तौर-तरीके भविष्य में सुरक्षित जीवन की संभावनाओं को नष्ट कर रहे हैं और इस जीती-जागती दुनिया को इतना बदल सकते हैं कि जिस रूप में जीवन को हमने जाना है, उसका अस्तित्व ही कठिन हो जाए।

इन प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों ने जोर देकर कहा कि प्रकृति की इस तबाही को रोकने के लिए बुनियादी बदलाव जरूरी है। बीसवीं शताब्दी की एक खास विशेषता, जो इसे पहले की शताब्दियों से एक अलग पहचान देती है, यह है कि इस शताब्दी के अंत तक पंहुचते-पहुंचते अनेक मानव निर्मित कारणों से ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो चुकी हैं जिनसे पृथ्वी पर मानव जीवन व अनेक अन्य तरह के जीवन का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है। मनुष्य ने अपने कार्यों से अपने अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया व साथ ही अनेक अन्य तरह के बेकसूर जीवों के अस्तित्व को भी- अब चाहे यह खतरा जलवायु तेजी से बदलने के रूप में उत्पन्न हुआ हो, ओजोन परत तेजी से लुप्त होने के रूप में हो, अणु हथियारों के विशालकाय भंडार के रूप में हो या अन्य तरह का हो। वर्ष 1992 की चेतावनी के 25 वर्ष पूरा होने पर एक बार फिर विश्व के बहुत जाने-माने वैज्ञानिकों ने वर्ष 2017 में एक नई अपील जारी की। इस अपील पर पहले से भी अधिक ध्यान आकर्षित हुआ।

इस पर 180 देशों के 13,524 वैज्ञानिकों व अन्य प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने हस्ताक्षर किया। इस बयान में कहा गया कि जिन गंभीर समस्याओं की ओर वर्ष 1992 में ध्यान दिलाया गया था उनमें से अधिकांश समस्याएं पहले से अधिक विकट हो रही हैं या उनको सुलझाने के प्रयास में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं है। केवल ओजोन परत संबंधी समस्या में कुछ महत्वपूर्ण उल्लेखनीय सफलता मिली है। अस्तित्व को संकट में डालने वाली अन्य समस्याएं पहले की तरह गंभीर स्थिति में मौजूद हैं या फिर उनकी स्थिति और विकट हुई है। दूसरी ओर ऐसी समस्याओं का समाधान धरती पर जीवन के अस्तित्व मात्र की रक्षा के लिए बहुत जरूरी है। स्टॉकहोम रेसिलियंस सेंटर के वैज्ञानिकों के अनुसंधान ने हाल के समय में धरती के सबसे बड़े संकटों की ओर ध्यान केंद्रित करने का प्रयास किया है। यह अनुसंधान बहुत चर्चित रहा है। इस अनुसंधान में धरती पर जीवन की सुरक्षा के लिए नौ विशिष्ट सीमा-रेखाओं की पहचान की गई है जिनका अतिक्रमण मनुष्य की क्रियाओं को नहीं करना चाहिए।

गहरी चिंता की बात है कि इन नौ में से तीन सीमाओं का अतिक्रमण होना आरंभ हो चुका है। यह तीन सीमाएं हैं- जलवायु बदलाव, जैव-विविधता का ह्रास व भूमंडलीय नाईट्रोजन चक्र में बदलाव। इसके अतिरिक्त चार अन्य सीमाएं ऐसी है जिसका अतिक्रमण होने की संभावना निकट भविष्य में है। यह चार क्षेत्र हैं-भूमंडलीय फास्फोरस चक्र, भूमंडलीय जल उपयोग, समुद्रों का अम्लीकरण व भूमंडलीय स्तर पर भूमि उपयोग में बदलाव। यह विभिन्न संकट अनेक स्तरों पर एक दूसरे से मिले हुए हैं व एक सीमा (जिसे प्रायरू टिपिंग पाईंट कहा जा रहा है) पार करने पर धरती की जीवनदायिनी क्षमता की इतनी क्षति हो सकती है उसे लौटा पाना कठिन होगा।

पिछले सात दशकों में विश्व की एक बड़ी विसंगति यह रही है कि महाविनाशक हथियारों के इतने भंडार मौजूद हैं जो सभी मनुष्यों को व अधिकांश अन्य जीवन-रूपों को एक बार नहीं कई बार ध्वस्त करने की विनाशक क्षमता रखते हैं। परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने के लिए गठित आयोग ने दिसंबर 2009 में जारी अपनी रिपोर्ट में कहा कि जब तक कुछ देशों के पास परमाणु हथियार हैं, अनेक अन्य देश भी उन्हें प्राप्त करने का प्रयास करेंगे। यहां तक कि आतंकवादी संगठन भी परमाणु हथियार प्राप्त करने की क्षमता रखते हैं। अन्य महाविनाशक हथियारों विशेषकर रासायनिक व जैविक हथियारों के प्रतिबंध के समझौते चाहे हो चुके हैं, पर विश्व इन हथियारों से मुक्त नहीं हुआ है।

जहां तक आतंकवादियों द्वारा महाविनाशक हथियारों के उपयोग का खतरा है तो यह परमाणु हथियारों की अपेक्षा रासायनिक हथियारों के संदर्भ में और भी अधिक है। स्पष्ट है कि जीवन के अस्तित्व को खतरे में डालने वाले खतरों को असहनीय हद तक बढ़ने दिया गया है और यही इस समय विश्व की सबसे विकट समस्या है। इस संकटग्रस्त विश्व में अब मुख्य उम्मीद तो विश्व में जनशक्ति के ऐसे उभार से ही रह जाती है जो संकीर्ण विभाजनों से ऊपर उठ कर विश्व को भावी पीढ़ियों के जीवन की रक्षा के सबसे आवश्यक कार्य में समर्पित करें।

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