आप के 7 राज्यसभा सांसदों के भाजपा में संभावित विलय पर सियासत तेज, सीएम मान ने राष्ट्रपति से हस्तक्षेप की मांग की

चंडीगढ़। आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों के भारतीय जनता पार्टी में संभावित विलय को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। इस घटनाक्रम के बीच पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने राष्ट्रपति से मिलने का समय मांगा है और इस मुद्दे पर हस्तक्षेप की मांग की है।

मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) की ओर से राष्ट्रपति को भेजे गए अनुरोध में कहा गया है कि राज्यसभा सांसदों के दलबदल के मामले में निर्वाचक मंडल यानी विधायकों का पक्ष भी सुना जाना चाहिए, क्योंकि ये सांसद उन्हीं के द्वारा चुने जाते हैं। जानकारी के अनुसार, मुख्यमंत्री अपने साथ पार्टी विधायकों के एक प्रतिनिधिमंडल के साथ राष्ट्रपति से मुलाकात कर पूरे मामले को विस्तार से रखेंगे।

कौन-कौन सांसद शामिल
भाजपा में शामिल होने वाले सांसदों में राघव चड्ढा, संदीप पाठक, अशोक मित्तल, हरभजन सिंह, राजेंद्र गुप्ता, विक्रमजीत सिंह साहनी और स्वाति मालीवाल का नाम सामने आ रहा है। इनमें से छह सांसद पंजाब से और एक दिल्ली से संबंधित हैं।

दलबदल कानून पर पेच
संविधान की दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) के अनुसार, यदि किसी दल के दो-तिहाई या उससे अधिक सांसद एक साथ किसी अन्य पार्टी में विलय करते हैं, तो उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जाता। आप के कुल 10 राज्यसभा सांसदों में से 7 के भाजपा में जाने की स्थिति में यह आंकड़ा लगभग 70 प्रतिशत होता है, जो इस प्रावधान के अंतर्गत आता है। ऐसे में इन सांसदों पर दलबदल कानून लागू करना कानूनी रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

रिकॉल की मांग, लेकिन स्पष्ट प्रावधान नहीं
सीएम भगवंत मान इस मामले में सांसदों को “रिकॉल” यानी वापस बुलाने के विकल्प पर भी चर्चा करना चाहते हैं। हालांकि, भारतीय संविधान में वर्तमान में सांसदों या विधायकों को वापस बुलाने का कोई स्पष्ट प्रावधान मौजूद नहीं है। इसके बावजूद, इस मुद्दे को उठाकर राज्य सरकार एक नई संवैधानिक बहस शुरू करना चाहती है।

मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने के संकेत
कानूनी विशेषज्ञों की राय इस पूरे मामले में बंटी हुई है। कुछ विशेषज्ञ इसे दलबदल कानून के तहत वैध मानते हैं, जबकि अन्य इसके तकनीकी और प्रक्रियात्मक पहलुओं पर सवाल उठा रहे हैं। यदि इस पर कोई औपचारिक चुनौती दी जाती है, तो मामला उच्चतम न्यायालय तक पहुंच सकता है।

फिलहाल, इस संभावित राजनीतिक घटनाक्रम ने राष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है, जहां कानून, नैतिकता और राजनीतिक रणनीति तीनों आमने-सामने दिखाई दे रहे हैं।

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