आबकारी नीति मामला: अदालत ने सीबीआई के जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच का निर्देश दिया

नई दिल्ली, 27 फरवरी । दिल्ली की एक विशेष अदालत ने कथित आबकारी नीति मामले में पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल सहित 23 आरोपियों को आरोपमुक्त करते हुए केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच की अनुशंसा की है। अदालत ने अपने विस्तृत आदेश में जांच प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्न उठाते हुए कहा कि एक लोकसेवक को फंसाने की कोशिश के संकेत मिलते हैं और इस पर जवाबदेही तय करना आवश्यक है।

विशेष न्यायाधीश जितेंद्र सिंह ने 598 पृष्ठों के आदेश में जांच की खामियों का उल्लेख करते हुए कहा कि अदालत का दायित्व केवल त्रुटिपूर्ण जांच सामग्री को खारिज करना ही नहीं, बल्कि दोषी पाए जाने पर संबंधित जांच अधिकारी के विरुद्ध उचित विभागीय कार्रवाई की अनुशंसा करना भी है। अदालत ने कहा कि आरोपी संख्या-1 कुलदीप सिंह, जो आबकारी विभाग में भारत निर्मित विदेशी शराब के पूर्व उपायुक्त थे, के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य नहीं पाए गए।

अदालत ने यह भी कहा कि जिन लोकसेवकों के खिलाफ ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं थे, उन्हें आरोपी बनाया जाना और उनके अभियोजन को मंजूरी मिलना चिंताजनक है। आदेश में कहा गया कि जिस प्रकार जांच संचालित की गई, वह निष्पक्ष और कानूनी मानकों के अनुरूप होने के बजाय कानून के शासन के मूल सिद्धांतों पर प्रश्न खड़े करती है।

न्यायालय ने विशेष रूप से इस तथ्य पर आपत्ति जताई कि एक व्यक्ति को पहले संदिग्धों की सूची में शामिल किया गया और बाद में आरोप पत्र दाखिल करते समय उसे अभियोजन पक्ष का गवाह बना दिया गया। अदालत ने इसे केवल प्रक्रियात्मक त्रुटि न मानते हुए कहा कि यह एक सोची-समझी रणनीति का संकेत देता है, जिसके तहत मामले को अस्पष्ट बनाए रखने का प्रयास किया गया।

आदेश में कहा गया कि इस तरह का रुख यह दर्शाता है कि जांच अधिकारी स्वयं आरोपों की कमजोरी से अवगत थे और न्यायिक परीक्षण में मामले के टिके रहने को लेकर आशंकित थे। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जांच एजेंसियों से रणनीतिक चतुराई नहीं, बल्कि निष्पक्षता, पारदर्शिता और तथ्यों के प्रति पूर्ण निष्ठा अपेक्षित होती है।

अदालत ने कहा कि संस्थागत विश्वसनीयता बनाए रखने और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए जांच अधिकारी के विरुद्ध विभागीय जांच आवश्यक है। न्यायालय ने अपने आदेश में इस बात पर बल दिया कि निष्पक्ष जांच किसी भी आपराधिक न्याय प्रणाली की आधारशिला है और इसमें किसी प्रकार की चूक या पक्षपात लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति जनविश्वास को प्रभावित करता है।

इस फैसले के साथ ही बहुचर्चित आबकारी नीति मामला एक महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत की टिप्पणी जांच एजेंसियों के कार्यप्रणाली पर व्यापक प्रभाव डाल सकती है और भविष्य में जांच की पारदर्शिता तथा जवाबदेही के मानकों को और कड़ा कर सकती है।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह निर्णय न केवल आरोपियों को राहत प्रदान करता है, बल्कि जांच तंत्र की प्रक्रियागत शुचिता पर भी गंभीर विमर्श को जन्म देता है। अदालत ने अपने आदेश के माध्यम से स्पष्ट संदेश दिया है कि न्यायिक प्रणाली में निष्पक्षता और विधिक मर्यादा सर्वोपरि हैं।

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