उप्र: धर्मांतरण मामले में तमिलनाडु निवासी आरोपी को जमानत

प्रयागराज, पांच फरवरी । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में कथित गैरकानूनी धर्मांतरण से जुड़े एक मामले में तमिलनाडु निवासी आरोपी देव साहयम डैनियल राज को जमानत दे दी है।

न्यायमूर्ति आशुतोष श्रीवास्तव ने आरोपों की प्रकृति, धर्मांतरण से जुड़े अपराधों में निर्धारित सजा की गंभीरता, सहायक साक्ष्यों की स्थिति तथा साक्ष्यों से छेड़छाड़ की संभावित आशंका पर विचार करते हुए जमानत का आदेश पारित किया। अदालत ने 28 जनवरी को स्पष्ट किया कि मामले के गुण-दोष पर टिप्पणी किए बिना आरोपी को राहत दी जा रही है।

पुलिस के अनुसार, डैनियल कथित तौर पर धर्मांतरण के लिए लोगों को प्रलोभन देने वाले गिरोह का सरगना था और उसने लगभग 70 लोगों का धर्मांतरण कराया था। पुलिस का दावा है कि सितंबर 2025 में गिरफ्तारी के समय उसकी साजिश करीब 500 लोगों का धर्मांतरण कराने की थी। डैनियल और उसका एक सह-आरोपी पारस 30 सितंबर 2025 से न्यायिक हिरासत में थे।

आरोपियों के खिलाफ उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 की धारा 3 और 5(1) के तहत मामला दर्ज किया गया था। पुलिस के मुताबिक, यह गिरोह गरीब, कमजोर वर्ग और आदिवासी समुदाय के लोगों को उपचार प्रार्थना सभाओं में बुलाकर आर्थिक सहायता का लालच देता था और उन्हें ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रेरित करता था।

पुलिस जांच में डैनियल ने बताया था कि उसे तमिलनाडु स्थित इंडियन मिशनरीज सोसाइटी ने फील्ड प्रभारी के रूप में नियुक्त किया था और वह जुलाई 2025 से क्षेत्र में सक्रिय था। उसने यह भी दावा किया था कि उसके अधिकार क्षेत्र में आठ मिशनरियां कार्यरत थीं, जिन्हें वेतन, भत्ते और प्रचार-प्रसार के लिए धन मुहैया कराया जाता था।
डैनियल के अनुसार, ये मिशनरियां गांवों में जाकर महिलाओं को सिलाई-कढ़ाई प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता देने के बहाने चर्च की गतिविधियों से जोड़ती थीं और धीरे-धीरे उनका धर्मांतरण किया जाता था।

वहीं, आरोपी के वकीलों ने अदालत में दलील दी कि उनका मुवक्किल निर्दोष है और उसे झूठे मामले में फंसाया गया है। उन्होंने कहा कि प्राथमिकी इंद्रासन सिंह नामक व्यक्ति द्वारा दर्ज कराई गई है, जो न तो किसी कथित पीड़ित का रिश्तेदार है और न ही प्रत्यक्ष रूप से पीड़ित, इसलिए प्राथमिकी के आधार पर मुकदमा बनाए रखने योग्य नहीं है।
बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि मामले में कोई आपत्तिजनक सामग्री बरामद नहीं हुई है।

इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए उच्च न्यायालय ने आरोपी को जमानत प्रदान कर दी।

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