एससी/एसटी बहुल सीटों पर तृणमूल का 60-दिवसीय जनसंपर्क अभियान

कोलकाता, 2 मार्च । तृणमूल कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल के अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति बहुल 84 विधानसभा क्षेत्रों में मतदाताओं से सीधे जुड़ने के उद्देश्य से 60-दिवसीय जनसंपर्क कार्यक्रम शुरू करने की घोषणा की है। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने बताया कि होली के बाद पांच मार्च से “तफसीली संलाप” नामक यह अभियान शुरू होगा, जो विधानसभा चुनावों से पहले जमीनी स्तर पर संगठन को सक्रिय करने की रणनीति का हिस्सा है।

अभियान के तहत पार्टी की अलग-अलग टीमें विशेष वाहनों से गांवों और बूथों तक पहुंचकर लोगों से संवाद करेंगी। प्रत्येक वाहन में तीन से पांच सदस्यों का दल होगा, जो मतदाताओं से बातचीत कर राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी देगा और स्थानीय मुद्दों को दर्ज करेगा। बनर्जी ने पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा कि चुनाव से पहले के अंतिम महीनों में संगठनात्मक सतर्कता और सक्रियता बेहद जरूरी है।

उन्होंने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी ने बार-बार हाशिये पर पड़े समुदायों का अपमान किया है और राज्य को केंद्रीय संसाधनों से वंचित रखा है। उनके अनुसार, केंद्र सरकार ने कई योजनाओं के लिए धनराशि जारी नहीं की, जिससे सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम प्रभावित हुए। बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चुनौती देते हुए कहा कि यदि केंद्र सरकार पिछले वर्षों में राज्य को पर्याप्त वित्तीय सहायता देने के प्रमाण प्रस्तुत करती है, तो वह राजनीति छोड़ देंगे।

उन्होंने दावा किया कि कथित वित्तीय बाधाओं के बावजूद ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने अपने संसाधनों से लाखों लाभार्थियों को आवास और सामाजिक सहायता प्रदान की है। तृणमूल नेता ने यह भी कहा कि पार्टी एससी/एसटी समुदायों के अधिकारों की रक्षा और सामाजिक न्याय के मुद्दे को चुनावी विमर्श के केंद्र में रखेगी।

अभियान के दौरान पार्टी प्रतिनिधि कथित तौर पर भाजपा की नीतियों और बयानों के प्रभावों पर भी चर्चा करेंगे। बनर्जी ने कार्यकर्ताओं से आग्रह किया कि वे विपक्ष की गतिविधियों का लोकतांत्रिक तरीके से जवाब दें और मतदाताओं तक पार्टी की उपलब्धियों का संदेश पहुंचाएं।

294 सदस्यीय पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनावों से पहले शुरू किया गया यह अभियान राज्य की राजनीति में चुनावी तापमान बढ़ने का संकेत माना जा रहा है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि आगामी चुनावों में सामाजिक समूहों के बीच समर्थन जुटाने की रणनीति निर्णायक भूमिका निभा सकती है।

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