नई दिल्ली, 10 मार्च । केंद्र सरकार ने भारत के साथ भूमि सीमा साझा करने वाले देशों, जिनमें चीन भी शामिल है, के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) नियमों में आंशिक ढील देने का फैसला किया है। अब इन देशों की 10 प्रतिशत तक हिस्सेदारी वाली विदेशी कंपनियां बिना अनिवार्य सरकारी अनुमति के भारत में निवेश कर सकेंगी।
सरकार ने यह निर्णय नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में लिया। इसके तहत 2020 के प्रेस नोट-3 में संशोधन किया गया है।
नई व्यवस्था के अनुसार, भूमि सीमा से लगे देशों के ऐसे गैर-नियंत्रणकारी निवेशकों को, जिनकी लाभकारी हिस्सेदारी 10 प्रतिशत तक है, स्वचालित मार्ग के तहत निवेश की अनुमति होगी। हालांकि इस निवेश पर संबंधित क्षेत्रों की सीमाएं और अन्य एफडीआई नियम पहले की तरह लागू रहेंगे।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि ऐसे निवेश से जुड़ी जानकारी पहले से उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (डीपीआईआईटी) को देना अनिवार्य होगा।
इसके साथ ही सरकार ने कुछ विशेष क्षेत्रों में भूमि सीमा से लगे देशों से आने वाले निवेश प्रस्तावों को तेजी से मंजूरी देने का भी फैसला किया है। पूंजीगत वस्तुओं, इलेक्ट्रॉनिक पूंजीगत उपकरणों, इलेक्ट्रॉनिक कलपुर्जों, पॉलीसिलिकॉन और इनगॉट-वेफर जैसे क्षेत्रों में निवेश प्रस्तावों पर 60 दिनों के भीतर निर्णय लिया जाएगा।
हालांकि इन मामलों में यह शर्त लागू रहेगी कि निवेशित इकाई में बहुसंख्यक हिस्सेदारी और नियंत्रण भारतीय नागरिकों या भारतीय स्वामित्व वाली इकाइयों के पास ही रहेगा।
सरकार ने अप्रैल 2020 में कोविड-19 महामारी के दौरान भारतीय कंपनियों के जबरन अधिग्रहण को रोकने के लिए प्रेस नोट-3 जारी किया था। इसके तहत भारत के साथ भूमि सीमा साझा करने वाले देशों से आने वाले सभी निवेश के लिए सरकारी अनुमति अनिवार्य कर दी गई थी।
भारत के साथ भूमि सीमा साझा करने वाले देशों में चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, म्यांमार और अफगानिस्तान शामिल हैं।
आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2000 से दिसंबर 2025 के बीच भारत में आए कुल एफडीआई इक्विटी प्रवाह में चीन की हिस्सेदारी केवल 0.32 प्रतिशत (करीब 2.51 अरब डॉलर) रही है और वह 23वें स्थान पर है।
हालांकि 2020 में गलवान घाटी में हुई झड़प के बाद दोनों देशों के संबंधों में तनाव आ गया था और भारत ने कई चीनी मोबाइल ऐप पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसके बावजूद द्विपक्षीय व्यापार में लगातार वृद्धि देखी गई है और चीन भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बनकर उभरा है।
