नयी दिल्ली, 4 अप्रैल (UNS)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़ी साप्ताहिक पत्रिका ऑर्गनाइजर ने अपने नवीनतम संपादकीय में कहा है कि पहचान आधारित विभाजनों के जरिए समाज में खाई पैदा करने के प्रयासों के बावजूद संघ ने भारत की राष्ट्रीय चेतना को जागृत और विस्तारित करने की “अद्भुत क्षमता” प्रदर्शित की है।
संपादकीय के अनुसार, संघ की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली इकाई अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा (एबीपीएस) ने पिछले वर्ष बेंगलुरु में आयोजित बैठक के दौरान ‘पंच परिवर्तन’ के एजेंडे के साथ समाज के वंचित वर्गों तक पहुंचने के अपने संकल्प को दोहराया था।
पत्रिका ने कहा कि इस वर्ष समालखा में आयोजित एबीपीएस की बैठक संघ के शताब्दी वर्ष समारोह के लिए निर्धारित लक्ष्यों की समीक्षा का अवसर बनी।
संपादकीय में बताया गया कि ‘पंच परिवर्तन’ का उद्देश्य भारतीय मूल्यों के साथ-साथ ‘स्व’ (आत्मबोध) की भावना विकसित करना, उचित पारिवारिक मूल्यों को आत्मसात करना, सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देना, पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली अपनाने और नागरिक कर्तव्यों के निर्वहन के लिए प्रेरित करना है।
पत्रिका के अनुसार, यह प्रक्रिया विजयादशमी उत्सव से शुरू हुई, जिसके तहत अक्टूबर 2025 से सक्रिय स्वयंसेवकों को व्यापक रूप से संगठित किया गया। 15 दिनों में 62,000 से अधिक कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनमें 32 लाख से ज्यादा स्वयंसेवकों ने भाग लिया।
इसके अलावा, देशभर में 22,000 स्थानों पर पथ संचलन आयोजित हुए, जिनमें 25 लाख से अधिक स्वयंसेवक शामिल हुए। संपादकीय में कहा गया कि पहले चरण में जागरूक लोगों के एक महत्वपूर्ण समूह को संगठित किया गया, जो अभियान को अगले चरण तक आगे बढ़ा सके।
पत्रिका के संपादक प्रफुल्ल केतकर ने लिखा कि जब पहचान आधारित विभाजन के प्रयास एक अस्थिर वैश्विक परिदृश्य के साथ मेल खाते हैं, तब संघ ने भारत की राष्ट्रीय चेतना को जगाने और विस्तारित करने की उल्लेखनीय क्षमता दिखाई है।
संपादकीय के अनुसार, देशभर में आयोजित हिंदू सम्मेलनों में जाति, पंथ, धर्म या राजनीतिक संबद्धता से परे तीन करोड़ से अधिक लोगों ने भाग लिया। इसके साथ ही सद्भाव बैठक और प्रमुख जन संगोष्ठी जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने और समाज के बौद्धिक व सामाजिक नेतृत्व को एक मंच पर लाने का प्रयास किया गया।
