आरएसएस प्रमुख ने घुसपैठियों पर चिंता जताई, अमेरिका व चीन की ‘आक्रामकता’ की निंदा की

मथुरा (उप्र), 24 मार्च (RNN)राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने देश में अवैध घुसपैठ को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए लोगों से अपील की कि वे संदिग्ध अवैध प्रवासियों की जानकारी प्रशासन को दें और यह सुनिश्चित करें कि उन्हें भारत में रोजगार न मिले।

भागवत मंगलवार को वृंदावन के रुक्मिणी विहार स्थित नव-निर्मित ‘जीवनदीप आश्रम’ के लोकार्पण के बाद आयोजित कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने विदेशियों की पहचान के लिए कड़ी जांच व्यवस्था की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि भारतीय नागरिकों के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए।

‘तीन संतान नीति’ पर जोर

संघ प्रमुख ने जनसंख्या संतुलन के मुद्दे पर तीन संतान नीति का समर्थन करते हुए कहा कि उच्च जन्म दर समाज के दीर्घकालिक संतुलन के लिए आवश्यक है। उन्होंने कहा कि डॉक्टर भी परिवार के स्वास्थ्य और बच्चों के सामाजिक विकास के लिए तीन बच्चों की सलाह देते हैं, क्योंकि भाई-बहनों के साथ मेलजोल से सामाजिक कौशल विकसित होते हैं।

उन्होंने जनसंख्या संबंधी अध्ययनों का हवाला देते हुए कहा कि तीन से कम प्रजनन दर लंबे समय में जोखिम पैदा कर सकती है। भागवत ने कहा कि कई देशों ने घटती जनसंख्या दर को बढ़ाने के लिए प्रयास किए हैं और परिवारों को दो बच्चों तक सीमित रहने के बजाय तीन बच्चों का लक्ष्य रखना चाहिए, हालांकि किसी भी नीति का निर्धारण करते समय जनहित सर्वोपरि होना चाहिए।

जबरन धर्मांतरण रोकने की अपील

मोहन भागवत ने जबरन धर्मांतरण को रोकने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि सरकार कानून बना सकती है, लेकिन समाज को भी इस दिशा में जिम्मेदारी निभानी होगी। उन्होंने यह भी दावा किया कि अनेक धर्मांतरित लोग मूल रूप से हिंदू रहे हैं और यदि वे वापस आना चाहते हैं तो उनका स्वागत किया जाना चाहिए।

अमेरिका और चीन की ‘आक्रामकता’ पर टिप्पणी

संघ प्रमुख ने वैश्विक परिप्रेक्ष्य में संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन जैसे देशों की ‘आक्रामक’ प्रवृत्ति की आलोचना करते हुए कहा कि भारत का दृष्टिकोण अन्य देशों पर अपनी विचारधारा थोपने का नहीं है। उन्होंने कहा कि अमेरिका अपने आर्थिक मॉडल को श्रेष्ठ बताता है, जबकि चीन अपने विकास मॉडल को सबके लिए उपयुक्त बताता है, लेकिन भारत का दृष्टिकोण अधिक उदार और समावेशी है।

आश्रम व्यवस्था और शिक्षा पर विचार

भागवत ने आश्रम व्यवस्था को भारतीय संस्कृति की विशिष्ट अवधारणा बताते हुए कहा कि यह मूल रूप से जीवन शिक्षा का केंद्र है। उन्होंने कहा कि अनुशासन और संस्कारों के साथ शिक्षा प्राप्त करने वाले लोग लंबे समय तक समाज की प्रभावी सेवा कर सकते हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि फिनलैंड की प्रशंसित शिक्षा प्रणाली भी कहीं न कहीं भारतीय गुरुकुल-आश्रम परंपरा से मेल खाती है और वास्तविक ज्ञान केवल आजीविका अर्जित करने तक सीमित नहीं होना चाहिए।

भागवत की ये टिप्पणियां ऐसे समय आई हैं, जब असम और पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं और अवैध प्रवासियों का मुद्दा राजनीतिक विमर्श में प्रमुख बना हुआ है।

इस कार्यक्रम में मोहन यादव, बृजेश पाठक सहित कई संत-महात्मा और जनप्रतिनिधि भी उपस्थित रहे।

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