मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा का कोई ऐड-ऑन नहीं, बल्कि सतत एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का आधार-स्तंभ है: डॉ. राजेश्वर सिंह

प्रिंसिपल्स कॉनक्लेव-2026 में बोले सरोजनीनगर विधायक, छात्रों-शिक्षकों की मानसिक सेहत को शिक्षा नीति का अभिन्न हिस्सा बनाने पर दिया जोर

लखनऊ। सरोजनीनगर विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने शनिवार को सुल्तानपुर रोड स्थित गोसाईगंज के स्कूल ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज (एसएमएस) में आयोजित प्रिंसिपल्स कॉनक्लेव-2026 में भाग लेते हुए कहा कि मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा का कोई वैकल्पिक या अतिरिक्त पक्ष नहीं, बल्कि सतत, प्रभावी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का मूल आधार-स्तंभ है।

इस प्रतिष्ठित सम्मेलन का विषय था— “Mental Health and Well-Being of Students and Educators: Creating a Supportive Ecosystem” (छात्रों एवं शिक्षकों का मानसिक स्वास्थ्य एवं सुख-समृद्धि: एक सहायक पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण)।

कॉनक्लेव को संबोधित करते हुए डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि भारत आज विश्व की सबसे बड़ी शिक्षा प्रणालियों में से एक का संचालन कर रहा है। स्कूली शिक्षा में जहां 24.8 करोड़ छात्र, 14.72 लाख विद्यालय और लगभग 98 लाख शिक्षक कार्यरत हैं, वहीं उच्च शिक्षा में 4.33 करोड़ छात्र 40,000 से अधिक संस्थानों में अध्ययनरत हैं। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के समय मात्र 10 प्रतिशत साक्षरता से बढ़कर आज लगभग 80 प्रतिशत साक्षरता दर तक पहुंचना शिक्षकों, प्रिंसिपलों और शैक्षणिक संस्थानों के समर्पण का परिणाम है।

डॉ. सिंह ने कहा कि शिक्षा व्यवस्था के इस व्यापक विस्तार, 82 प्रतिशत हाइब्रिड लर्निंग के अपनाव, 10.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर के एडटेक बाजार, शिक्षा पर जीडीपी के लगभग 6.5 प्रतिशत निवेश और एआई-डिजिटल टूल्स के तेजी से एकीकरण के बावजूद, मानसिक स्वास्थ्य की चुनौतियां लगातार गंभीर होती जा रही हैं।

उन्होंने WHO इंडिया, NCERT मानसिक स्वास्थ्य सर्वे, द लैंसेट साइकियाट्री और UNICEF इंडिया के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि हर पांच में से तीन छात्र चिंता से ग्रस्त हैं, लगभग 70 प्रतिशत छात्र अकादमिक तनाव झेल रहे हैं और 50 प्रतिशत से अधिक छात्रों में अवसाद के शुरुआती लक्षण दिखाई दे रहे हैं। वहीं शिक्षकों की स्थिति पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि चार में से एक शिक्षक नियमित सेल्फ-केयर नहीं कर पाता, जबकि 55 प्रतिशत शिक्षक कार्य-संबंधित तनाव से प्रभावित हैं, जिससे बर्नआउट और पेशेगत असंतोष बढ़ रहा है।

डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि शिक्षा संस्थानों में प्रिंसिपलों की भूमिका निर्णायक होती है। “शिक्षक कक्षा का निर्माण करते हैं, लेकिन प्रिंसिपल पूरे संस्थान की मानवीय, संतुलित और सहयोगी संस्कृति गढ़ते हैं।” उन्होंने वेलनेस कैलेंडर, प्रशिक्षित काउंसलर, और सुरक्षित संवाद मंचों को शिक्षा व्यवस्था की अनिवार्य आवश्यकता बताते हुए कहा कि मानसिक स्वास्थ्य अब वैकल्पिक नहीं, बल्कि अनिवार्य है।

कॉनक्लेव में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित पूर्व आईएएस अधिकारी एवं सुशांत यूनिवर्सिटी, गुरुग्राम के कुलपति जय शंकर मिश्रा की सराहना करते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि उनकी प्रशासनिक, शैक्षणिक और साहित्यिक दृष्टि प्रेरणादायक है और शिक्षा जगत के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो रही है।

उन्होंने इस सफल आयोजन के लिए एसएमएस कॉलेज, लखनऊ की पूरी टीम को बधाई देते हुए श्री आनंद के. सिन्हा (सचिव, AKWL), ए.के. माथुर, डॉ. धर्मेंद्र सिंह, डॉ. आशीष भटनागर, डॉ. बी.आर. सिंह, डॉ. जगदीश सिंह, डॉ. वी.बी. सिंह, श्री सुरेंद्र श्रीवास्तव, डॉ. पी.के. सिंह, राहुल अवस्थी और आदित्य प्रताप सिंह सहित सभी विशिष्ट अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

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