हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म छोड़ अन्य धर्म अपनाने पर समाप्त हो जाता है एससी का दर्जा: उच्चतम न्यायालय

नयी दिल्ली, 24 मार्चउच्चतम न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में मंगलवार को कहा कि अनुसूचित जाति (एससी) समुदाय का कोई व्यक्ति यदि हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को अपनाता है, तो धर्मांतरण के समय से ही वह अनुसूचित जाति का दर्जा खो देता है और उससे जुड़े सभी वैधानिक लाभ स्वतः समाप्त हो जाते हैं।

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश को बरकरार रखते हुए यह टिप्पणी की।

धर्म परिवर्तन के साथ ही समाप्त हो जाते हैं सभी लाभ

शीर्ष अदालत ने कहा कि संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के अनुच्छेद 3 के तहत यह प्रावधान स्पष्ट है कि हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म का पालन करने वाले व्यक्ति को अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जैसे ही कोई व्यक्ति किसी अन्य धर्म में धर्मांतरण करता है, उसी समय से उसका एससी दर्जा पूरी तरह समाप्त हो जाता है और उससे जुड़े सभी लाभ, सुरक्षा, आरक्षण और वरीयताएं स्वतः खत्म हो जाती हैं।

जनजातीय पहचान और परंपराओं का भी होता है प्रभाव

पीठ ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन के बाद अपने समुदाय की परंपराओं, रीति-रिवाजों और सामाजिक पहचान को पूरी तरह छोड़ देता है और नए धर्म की प्रथाओं में पूरी तरह आत्मसात हो जाता है, तो उसे उस समुदाय का हिस्सा नहीं माना जा सकता।

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 में वर्ष 1956 में संशोधन कर सिख धर्म मानने वालों को शामिल किया गया था और वर्ष 1990 में इसे बौद्ध धर्म मानने वालों तक विस्तारित किया गया, लेकिन ईसाई धर्म को इस आदेश के अंतर्गत शामिल नहीं किया गया है।

आंध्र प्रदेश के मामले से जुड़ा है फैसला

यह मामला उस शिकायत से संबंधित है, जिसमें एक पादरी ने वर्ष 2021 में आंध्र प्रदेश के एक गांव में रविवार की प्रार्थना के दौरान उन पर हमला और जातिसूचक शब्दों से अपमान किए जाने का आरोप लगाया था।
इस मामले में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने 30 अप्रैल 2025 को फैसला दिया था कि यदि कोई व्यक्ति ईसाई धर्म अपनाकर उसका सक्रिय रूप से पालन करता है, तो उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता।

शीर्ष अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि कोई व्यक्ति व्यक्तिगत, सामाजिक या आध्यात्मिक कारणों से किसी धर्म का पालन कर सकता है, लेकिन वैधानिक लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से अनुसूचित जाति की सदस्यता का दावा कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं होगा।

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