2047 तक विकसित भारत की यात्रा एक समुद्री सफर जैसी: नौसेना प्रमुख एडमिरल त्रिपाठी

रांची, 23 जनवरी । नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश कुमार त्रिपाठी ने शुक्रवार को ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य की तुलना एक समुद्री यात्रा से करते हुए कहा कि भारत सहित वैश्विक अर्थव्यवस्थाएं व्यापार और विकास के लिए बड़े पैमाने पर महासागरों पर निर्भर हैं।

रांची में सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (सीसीएल) के ‘दरभंगा हाउस’ सम्मेलन कक्ष में छात्रों को संबोधित करते हुए नौसेना प्रमुख ने कहा कि विश्व का लगभग 90 प्रतिशत निर्यात-आयात व्यापार समुद्री मार्गों से होता है, जबकि भारत का करीब 95 प्रतिशत व्यापार इन्हीं रास्तों से संचालित होता है। ऐसे में 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने में महासागर एक प्रमुख माध्यम बन जाते हैं।

उन्होंने कहा, “विकसित भारत 2047 अब केवल एक नीति नहीं रहा, बल्कि यह एक वास्तविकता का रूप ले चुका है। इसके लिए स्पष्ट लक्ष्य और पड़ाव तय किए गए हैं। भौगोलिक दृष्टि से भारत तीन ओर से महासागरों से घिरा हुआ है और यह हमारी जिम्मेदारी है कि समुद्री मार्गों को हर प्रकार की बाधा से सुरक्षित रखा जाए।”

एडमिरल त्रिपाठी ने कहा कि भारतीय नौसेना हिंद महासागर क्षेत्र में ‘फर्स्ट रिस्पॉन्डर’ के रूप में उभरी है और आज वैश्विक स्तर पर इसी भूमिका के लिए जानी जाती है। उन्होंने बताया कि भारत की ‘नीली अर्थव्यवस्था’ का योगदान फिलहाल कुल अर्थव्यवस्था में केवल चार प्रतिशत है, जिसे विकसित भारत के लक्ष्य के अनुरूप दहाई अंकों तक बढ़ाने की आवश्यकता है।

नौसेना प्रमुख ने कहा कि भारत की ऊर्जा जरूरतों का करीब 88 प्रतिशत हिस्सा समुद्री मार्गों से आयात होता है। उन्होंने बताया कि कच्चे तेल की कीमत में प्रति मीट्रिक टन एक अमेरिकी डॉलर की वृद्धि होने पर देश को अतिरिक्त 10,000 करोड़ रुपये का भार उठाना पड़ता है, जिससे समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा का महत्व और बढ़ जाता है।

उन्होंने भारतीय नौसेना की मानवीय सहायता और आपदा राहत भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि म्यांमा में आए भूकंप के बाद भारत सबसे पहले 500 टन राहत सामग्री लेकर वहां पहुंचा था, जबकि श्रीलंका में 1,000 टन राहत सामग्री उपलब्ध कराई गई।

एडमिरल त्रिपाठी ने कहा कि नौसेना की प्राथमिक भूमिका युद्धक कार्रवाई है, लेकिन उससे पहले प्रभावी प्रतिरोधक क्षमता का निर्माण सबसे महत्वपूर्ण होता है। उन्होंने चेतावनी दी कि समुद्री मार्गों में मामूली सा व्यवधान भी वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर बड़े प्रभाव डाल सकता है।

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