ईरान ने भारत समेत पांच देशों को होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति दी

तेहरान/नई दिल्ली, 26 मार्च (UNS)। ईरान ने भारत, चीन, रूस, पाकिस्तान और इराक जैसे ‘‘मित्र देशों’’ को वाणिज्यिक नौवहन के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य का इस्तेमाल करने की अनुमति दे दी है। यह जानकारी ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने दी।

ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को आंशिक रूप से अवरुद्ध किए जाने के बाद वैश्विक स्तर पर तेल और गैस की कीमतों में उछाल देखने को मिला है। यह जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच स्थित एक संकरा नौवहन मार्ग है, जिससे दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और एलएनजी (द्रवीकृत प्राकृतिक गैस) का परिवहन होता है। पश्चिम एशिया, भारत की ऊर्जा जरूरतों का एक प्रमुख स्रोत रहा है।

ईरानी सरकारी टेलीविजन के अनुसार, विदेश मंत्री अराघची ने कहा, “हमने कुछ ऐसे देशों को इस जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति दी है जिन्हें हम मित्र मानते हैं। चीन, रूस, भारत, इराक और पाकिस्तान को आवागमन की अनुमति दी गई है।”

उन्होंने साथ ही स्पष्ट किया कि ईरान के शत्रुओं से जुड़े पोतों को इस जलमार्ग से गुजरने की अनुमति नहीं दी जाएगी। अराघची ने कहा, “हम युद्ध की स्थिति में हैं। यह क्षेत्र युद्ध क्षेत्र बना हुआ है और हमारे दुश्मनों एवं उनके सहयोगियों के पोतों को इससे गुजरने देने का कोई कारण नहीं है, लेकिन यह अन्य देशों के लिए खुला है।”

समाचार एजेंसी ‘मेहर’ के अनुसार, संघर्ष समाप्त करने के लिए अन्य देशों द्वारा मध्यस्थता के प्रयासों पर उन्होंने कहा कि अमेरिका के साथ कोई बातचीत नहीं चल रही है, हालांकि क्षेत्र के कई देशों के विदेश मंत्रियों ने तेहरान से संपर्क किया है। उन्होंने यह भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय गारंटी पूरी तरह विश्वसनीय नहीं होती हैं।

होर्मुज जलडमरूमध्य से वाणिज्यिक नौवहन में व्यवधान को लेकर वैश्विक चिंताएं बढ़ गई हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को चेतावनी दी है कि यदि वह इस जलमार्ग को पूरी तरह से नहीं खोलता है तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

पिछले कुछ सप्ताह में भारत ने पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को जल्द समाप्त कराने और होर्मुज जलडमरूमध्य से ऊर्जा आपूर्ति का निर्बाध आवागमन सुनिश्चित करने के लिए कूटनीतिक प्रयास तेज किए हैं। भारत का मानना है कि यदि इस महत्वपूर्ण नौवहन मार्ग पर अवरोध जारी रहा, तो भारत सहित कई देशों की ईंधन और उर्वरक सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

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