ममता बनर्जी के शासन में बंगाल की हालत से हूं ‘दुखी’, राज्य में बदलाव ‘अपरिहार्य’ : मोदी

कोलकाता, 23 फरवरी — नरेंद्र मोदी ने पश्चिम बंगाल के मतदाताओं को संबोधित एक खुले पत्र में राज्य की मौजूदा स्थिति पर चिंता जताते हुए राजनीतिक बदलाव को “अपरिहार्य” बताया और “विकसित पश्चिम बंगाल” के निर्माण का संकल्प दोहराया। विधानसभा चुनाव की घोषणा से कुछ सप्ताह पहले जारी इस पत्र में उन्होंने रोजगार, महिलाओं की सुरक्षा, कथित फर्जी मतदाता और सीमापार घुसपैठ जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया।

प्रधानमंत्री ने कहा कि कभी वित्तीय और औद्योगिक रूप से अग्रणी रहा बंगाल आज विकास की दौड़ में पीछे छूट गया है, जिससे उन्हें “गहरा दुख” होता है। उन्होंने आरोप लगाया कि लंबे समय से चले आ रहे कुशासन और तुष्टीकरण की राजनीति ने राज्य को कमजोर किया है। पत्र की शुरुआत उन्होंने ‘जय मां काली’ के उद्घोष के साथ की और युवाओं के पलायन को रोकने, महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा राज्य की “पुरानी शान” बहाल करने का वादा किया।

अपने संदेश में उन्होंने स्वामी विवेकानंद, श्री अरविंद, सुभाष चंद्र बोस, रवींद्रनाथ टैगोर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे महान व्यक्तित्वों का उल्लेख करते हुए कहा कि उनकी विरासत के अनुरूप राज्य को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। उन्होंने संशोधित नागरिकता कानून के माध्यम से धार्मिक उत्पीड़न के शिकार शरणार्थियों को नागरिकता देने और सीमाओं की सुरक्षा सख्त करने का भी आश्वासन दिया।

प्रधानमंत्री के इस पत्र पर तीखी राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी के प्रवक्ता कुणाल घोष ने इसे चुनाव से पहले की “नाटकबाज़ी” करार दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि यदि केंद्र सरकार राज्य की स्थिति को लेकर चिंतित है तो उसने विभिन्न विकास योजनाओं के लिए धन क्यों रोका हुआ है। पार्टी का दावा है कि सामाजिक कल्याण के कई संकेतकों में राज्य अब भी अग्रणी बना हुआ है।

वहीं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी ने पत्र के समय पर सवाल उठाते हुए कहा कि चुनाव से ठीक पहले ऐसी अपील राजनीतिक रणनीति का हिस्सा प्रतीत होती है।

राज्य में चुनावी सरगर्मियों के बीच भारतीय जनता पार्टी ने “गृह संपर्क अभियान” के तहत प्रधानमंत्री का संदेश घर-घर तक पहुँचाने की योजना बनाई है। दूसरी ओर, सत्तारूढ़ दल ने केंद्र सरकार और भाजपा शासित राज्यों में कानून-व्यवस्था के मुद्दों को उठाते हुए पलटवार तेज कर दिया है।

विश्लेषकों के अनुसार, यह पत्र आगामी चुनावों से पहले राजनीतिक विमर्श को और धार देने वाला कदम माना जा रहा है, जिसमें विकास, शासन और सुरक्षा के मुद्दे केंद्र में रहने की संभावना है।

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