लोकसभा अध्यक्ष को हटाने के प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान ओम बिरला नहीं करेंगे कार्यवाही की अध्यक्षता

नई दिल्ली, 5 मार्च । लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पद से हटाने के लिए दिए गए प्रस्ताव पर अगले सप्ताह सोमवार को विचार किए जाने के दौरान वह सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता नहीं करेंगे और सदस्यों के बीच बैठेंगे।

बजट सत्र के दूसरे चरण की शुरुआत नौ मार्च से होने जा रही है। लोकसभा में बिरला के खिलाफ विपक्ष द्वारा लाए गए प्रस्ताव पर उसी दिन चर्चा हो सकती है। प्रस्ताव में उन पर सदन की कार्यवाही के संचालन में ‘‘खुलकर भेदभाव’’ करने का आरोप लगाया गया है।

नियमों और संसदीय प्रक्रिया के अनुसार जब लोकसभा अध्यक्ष को हटाने के प्रस्ताव पर चर्चा होती है, तो वह सदन की अध्यक्षता नहीं कर सकते। हालांकि उन्हें सदन में उपस्थित रहने और अपने ऊपर लगे आरोपों के खिलाफ अपना पक्ष रखने का अधिकार होता है।

संविधान विशेषज्ञ पी. डी. टी. आचारी ने बताया कि प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान ओम बिरला सदन की कार्यवाही का संचालन नहीं करेंगे, बल्कि सत्तापक्ष की अग्रिम पंक्ति में बैठेंगे। उन्होंने कहा कि लोकसभा अध्यक्ष को प्रस्ताव के पक्ष या विपक्ष में मतदान करने का भी अधिकार होता है, लेकिन वह स्वचालित मतदान प्रणाली के बजाय पर्ची भरकर अपना मत देंगे।

लोकसभा सचिवालय के एक अधिकारी के अनुसार, जिस दिन विपक्ष ने उन्हें हटाने का नोटिस दिया था, उसी दिन से बिरला ने सदन की अध्यक्षता करना बंद कर दिया था। अधिकारी ने कहा कि वह चाहें तो नोटिस प्रस्तुत किए जाने तक सदन की अध्यक्षता कर सकते थे, लेकिन उन्होंने प्रस्ताव के निपटारे तक कार्यवाही से दूर रहने का फैसला किया, जो नैतिकता के उच्च मानकों का पालन दर्शाता है।

बताया गया कि कम से कम 118 विपक्षी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को हटाने के लिए प्रस्ताव का नोटिस दिया है। विपक्ष ने आरोप लगाया है कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं को बोलने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया।

कांग्रेस सांसद और लोकसभा में पार्टी के मुख्य सचेतक सुरेश ने कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम समेत कई विपक्षी दलों की ओर से लोकसभा सचिवालय को यह नोटिस सौंपा। हालांकि तृणमूल कांग्रेस के सांसदों ने इस नोटिस पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं।

संविधान के अनुच्छेद 96 के अनुसार, लोकसभा अध्यक्ष या उपाध्यक्ष उस समय सदन की अध्यक्षता नहीं कर सकते जब उन्हें पद से हटाने के प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा हो। हालांकि उन्हें सदन में अपना बचाव करने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है।

लोकसभा अध्यक्ष को हटाने के लिए प्रस्ताव सदन में साधारण बहुमत से पारित होना आवश्यक होता है। बहुमत की गणना सदन की कुल प्रभावी सदस्यता के आधार पर की जाती है, न कि केवल उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के आधार पर।

इतिहास में पहले भी कुछ लोकसभा अध्यक्षों को इस तरह के प्रस्तावों का सामना करना पड़ा है। इनमें जी. वी. मावलंकर, हुकम सिंह और बलराम जाखड़ शामिल हैं, हालांकि इन सभी मामलों में प्रस्ताव पारित नहीं हो सके थे।

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