लोकतंत्र उच्च शिक्षा में निवेश इसलिए करता है ताकि स्नातक स्वयं को अनुशासित कर सकें : प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत

चंडीगढ़, 14 मार्च (Agency)। भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने शनिवार को कहा कि लोकतंत्र उच्च शिक्षा में केवल इसलिए निवेश नहीं करता कि उसके स्नातक समृद्ध बनें, बल्कि इसलिए करता है ताकि वे स्वयं को बेहतर ढंग से अनुशासित कर सकें और समाज में जिम्मेदार भूमिका निभा सकें।

महेंद्रगढ़ स्थित हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय के 12वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि सार्वजनिक जीवन की हर संस्था—अदालतें, सिविल सेवाएं, स्कूल, अस्पताल और स्थानीय प्रशासनिक निकाय—इन सभी की गुणवत्ता उन लोगों की योग्यता पर निर्भर करती है, जिन्हें इन संस्थाओं में सेवा करने के लिए चुना जाता है।

उन्होंने कहा कि महज 17 वर्षों में विश्वविद्यालय ने तेजी से प्रगति की है और राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता तथा पहचान हासिल की है।

प्रधान न्यायाधीश ने छात्रों से कहा कि उन्हें प्राप्त डिग्री उनके द्वारा अर्जित ज्ञान का प्रमाण है और इस पर उन्हें गर्व होना चाहिए। हालांकि उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि औपचारिक शिक्षा की संरचना से बाहर आने के बाद व्यक्ति का चरित्र और निर्णय क्षमता कैसी रहती है, इसे कोई डिग्री या परीक्षा पूरी तरह नहीं माप सकती।

उन्होंने कहा, “मेरे अनुभव में यही चीज अंततः जीवन की दिशा निर्धारित करती है।”

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि कई प्रतिष्ठित संस्थानों के स्नातक भी दबाव की परिस्थितियों में लड़खड़ा जाते हैं। इसका कारण ज्ञान की कमी नहीं होता, बल्कि यह होता है कि उनकी परीक्षा केवल स्कूल या कॉलेज की परीक्षाओं तक सीमित रही होती है।

उन्होंने कहा कि दूसरी ओर ऐसे भी पेशेवर हैं जो अपेक्षाकृत कम प्रसिद्ध संस्थानों से आते हैं, लेकिन संयम और गंभीरता के साथ आगे बढ़ते हैं और जिस भी स्थान पर जाते हैं वहां लोगों का विश्वास अर्जित कर लेते हैं।

प्रधान न्यायाधीश ने सवाल उठाया कि ऐसा अंतर किस कारण से पैदा होता है। उन्होंने कहा कि उनके विचार में इसका कक्षा में दिखाई गई प्रतिभा से बहुत कम संबंध है, बल्कि इसका अधिकतर संबंध व्यक्ति के पालन-पोषण से होता है।

उन्होंने कहा कि जो लोग अपने परिवारों को कठिन परिस्थितियों में भी गरिमा के साथ संघर्ष करते हुए देखकर बड़े होते हैं, जो बचपन से समझ लेते हैं कि दुनिया उनकी सुविधा के अनुसार नहीं बदलती और जो पेशेवर जीवन में प्रवेश करते समय यह जानते हैं कि कड़ी मेहनत एक अस्थायी चरण नहीं बल्कि स्थायी अवस्था है, वे अपने साथ ऐसी गंभीरता लेकर आते हैं जिसे कोई पाठ्यक्रम नहीं सिखा सकता।

उन्होंने कहा कि समारोह में उपस्थित कई छात्र भी इसी तरह के अनुभवों से आगे बढ़कर यहां तक पहुंचे हैं।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि कई छात्रों का पालन-पोषण ऐसे परिवारों में हुआ है जहां विश्वविद्यालय की डिग्री कोई अनिवार्य योग्यता नहीं थी, बल्कि ऐसा लक्ष्य था जिसके लिए पूरा परिवार एकजुट होकर प्रयास करता था।

उन्होंने कहा कि परिवारों द्वारा किया गया यह निवेश केवल इसलिए नहीं था कि छात्र आरामदायक जीवन जी सकें, बल्कि इसलिए था क्योंकि उन्हें विश्वास था कि एक शिक्षित बेटी या बेटा अपनी शिक्षा का उपयोग समाज में कुछ बेहतर निर्माण करने के लिए करेगा।

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