भारत के लिए फिलहाल कॉलेजियम प्रणाली सबसे उपयुक्त : पूर्व प्रधान न्यायाधीश गवई

बेंगलुरु, 22 मार्च । देश के पूर्व प्रधान न्यायाधीश बी.आर. गवई ने कहा है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए मौजूदा कॉलेजियम प्रणाली फिलहाल भारत के लिए सबसे उपयुक्त व्यवस्था है, हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि कोई भी प्रणाली पूरी तरह त्रुटिहीन नहीं हो सकती।

न्यायमूर्ति गवई यहां सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) के पहले राष्ट्रीय सम्मेलन-2026 के समापन सत्र को संबोधित कर रहे थे, जिसका विषय था—“न्यायिक शासन की पुनर्कल्पना: लोकतांत्रिक न्याय के लिए संस्थानों को मजबूत करना।”

अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि कॉलेजियम प्रणाली मनमाने ढंग से काम नहीं करती, बल्कि एक सुविचारित प्रक्रिया के तहत न्यायाधीशों के नामों की सिफारिश की जाती है। उन्होंने बताया कि उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों की कॉलेजियम द्वारा नाम प्रस्तावित किए जाते हैं, जिन्हें केंद्र सरकार के पास भेजा जाता है। इसके बाद सरकार और अन्य एजेंसियों से सुझाव प्राप्त होने के पश्चात सर्वोच्च न्यायालय की कॉलेजियम अंतिम निर्णय लेती है।

पूर्व प्रधान न्यायाधीश ने न्यायाधीशों की नियुक्ति में देरी पर चिंता जताते हुए कहा कि उच्चतम न्यायालय ने कई बार स्पष्ट किया है कि यदि कॉलेजियम किसी नाम की दूसरी बार सिफारिश करता है, तो कार्यपालिका को नियुक्ति करना अनिवार्य होता है। उन्होंने खेद व्यक्त किया कि कई ऐसे नाम हैं, जिन्हें दूसरी सिफारिश के बाद भी अभी तक मंजूरी नहीं मिली है।

न्यायमूर्ति गवई ने अदालतों में लंबित मामलों की बढ़ती संख्या पर भी चिंता जताई और कहा कि सरकार को राष्ट्रीय वाद नीति (नेशनल लिटिगेशन पॉलिसी) पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि कार्यपालिका इस नीति को प्रभावी ढंग से लागू करती है, तो इससे लंबित मामलों की संख्या कम करने में वास्तविक मदद मिल सकती है।

पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि अदालतें केवल हस्तक्षेप करने के लिए पर्यावरण मामलों में दखल नहीं देतीं, बल्कि उनके निर्णयों के कारण ही देश के जंगल और पर्यावरण सुरक्षित रह पाए हैं। उन्होंने इस धारणा को खारिज किया कि न्यायपालिका विकास कार्यों में बाधा बनती है।

पूर्व प्रधान न्यायाधीश ने यह भी कहा कि न्यायपालिका हमेशा संयम के साथ अपनी शक्तियों का प्रयोग करती है और तभी हस्तक्षेप करती है, जब नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है या संवैधानिक संस्थाओं के बीच शक्ति संतुलन बिगड़ने की आशंका होती है। उन्होंने कहा कि कानून के शासन को बनाए रखना और विकास के साथ संतुलन स्थापित करना ही “विकसित भारत” की परिकल्पना का आधार होना चाहिए।

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