चंदौली (उप्र), 6 अप्रैल, RNN। पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण ईंधन की बढ़ती चुनौतियों के बीच उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले का एक गांव बायोगैस के माध्यम से आत्मनिर्भर बनकर मिसाल पेश कर रहा है। यहां 125 से अधिक घरों के रसोईघर एलपीजी की तुलना में लगभग आधी कीमत पर चल रहे हैं, जिससे ग्रामीणों को आर्थिक राहत मिलने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिल रही है।
वाराणसी के पास चंदौली जिले के अलीनगर क्षेत्र के नियामताबाद ब्लॉक के एकौनी गांव में स्थापित यह बायोगैस संयंत्र अपनी किफायती लागत और पर्यावरणीय लाभों के कारण चर्चा का विषय बना हुआ है। स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में कार्यरत पुणे की एक कंपनी के सहयोग से स्थापित यह संयंत्र लगभग 500 से 600 की आबादी वाले गांव के करीब 125 परिवारों को नियमित रूप से गैस की आपूर्ति कर रहा है।
गांव निवासी और किसान नागेन्द्र प्रताप सिंह ने बताया कि उनकी गौशाला वर्ष 1995 से संचालित हो रही है, जिसमें करीब 200 गायें हैं। उन्होंने कहा कि उनके बेटे चन्द्रप्रकाश सिंह, जो बीटेक की पढ़ाई कर चुके हैं, ने ईंधन की समस्या के समाधान के लिए शोध किया और बाद में पुणे की कंपनी के सहयोग से वर्ष 2016 में गौशाला का आधुनिकीकरण कर इसे आधुनिक तकनीक से जोड़ा गया।
एलपीजी की आधी कीमत में मिल रही ऊर्जा, स्वच्छ ईंधन मॉडल ने आसपास के गांवों का भी ध्यान खींचा
चन्द्रप्रकाश सिंह ने बताया कि कंपनी की मदद से गांव में बायोगैस संयंत्र स्थापित किया गया, जिस पर लगभग 85 लाख रुपये की लागत आई। उन्होंने बताया कि संयंत्र के लिए वित्त पोषण भी कंपनी ने ही किया और तब से यह लगातार सुचारु रूप से संचालित हो रहा है।
उन्होंने कहा कि गांव में प्रतिदिन सुबह और शाम करीब ढाई-ढाई घंटे बायोगैस की आपूर्ति की जाती है। इस गैस का मासिक खर्च अधिकतम 400 रुपये तक आता है, जो एलपीजी की तुलना में लगभग आधा है। इससे ग्रामीणों की घरेलू खर्च में काफी कमी आई है और वे स्वच्छ ईंधन का उपयोग कर रहे हैं।
चन्द्रप्रकाश सिंह ने बताया कि वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईंधन संकट की स्थिति के कारण इस बायोगैस मॉडल की उपयोगिता और बढ़ गई है। आसपास के अन्य गांवों के लोग भी इस परियोजना से प्रभावित होकर कनेक्शन लेने में रुचि दिखा रहे हैं और हाल ही में करीब 25 नए उपभोक्ता इस प्रणाली से जुड़े हैं।
पुणे की संस्था सस्टेन प्लस फाउंडेशन के सह-संस्थापक हर्षद कुलकर्णी ने बताया कि वर्ष 2022 में चन्द्रप्रकाश के परिवार द्वारा उपलब्ध कराई गई जमीन पर इस बायोगैस संयंत्र का विस्तार किया गया। इसके बदले कंपनी ने उनके परिवार को दो से तीन गैस कनेक्शन प्रदान किए और गौशाला से रोजाना गोबर एकत्र कर संयंत्र तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी अपने ऊपर ली।
उन्होंने बताया कि इस परियोजना से गांव के दो लोगों को स्थायी रोजगार भी मिला है। साथ ही योजना के तहत वर्ष 2032 में संयंत्र का पूर्ण स्वामित्व चन्द्रप्रकाश सिंह के परिवार को सौंप दिया जाएगा।
ग्रामीणों का कहना है कि यह बायोगैस संयंत्र न केवल सस्ती ऊर्जा का स्रोत बना है, बल्कि स्वच्छ और पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली को भी बढ़ावा दे रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि इस मॉडल को अन्य गांवों में भी लागू किया जाए, तो ग्रामीण क्षेत्रों में ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकता है।
