खरमास से पहले कार्यकारी अध्यक्ष, बाद में पूर्ण अध्यक्ष? भाजपा के फैसले के पीछे की पूरी कहानी

नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी ने रविवार को अपने संगठन में बड़ा बदलाव करते हुए बिहार सरकार के मंत्री नितिन नवीन को पार्टी का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त कर दिया। इसके साथ ही जेपी नड्डा औपचारिक रूप से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हट गए। यह नियुक्ति 14 दिसंबर 2025 से तत्काल प्रभाव से लागू हो गई है। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव एवं मुख्यालय प्रभारी अरुण सिंह की ओर से जारी आदेश में बताया गया कि यह फैसला पार्टी के संसदीय बोर्ड ने लिया है।

जेपी नड्डा का कार्यकाल तकनीकी रूप से वर्ष 2024 में ही समाप्त हो चुका था, लेकिन संगठनात्मक चुनावों में आ रही व्यावहारिक अड़चनों के चलते उनका कार्यकाल एक साल के लिए बढ़ा दिया गया था। अब नितिन नवीन को कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपे जाने के बाद यह सवाल राजनीतिक गलियारों में जोर पकड़ रहा है कि भाजपा ने अभी पूर्णकालिक राष्ट्रीय अध्यक्ष का एलान क्यों नहीं किया?

खरमास बना बड़ा कारण

भाजपा के इस फैसले को खरमास से जोड़कर देखा जा रहा है। मंगलवार से खरमास की शुरुआत हो रही है, जो 14 जनवरी 2026 (मकर संक्रांति) तक चलेगा। हिंदू धर्म और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जब सूर्य धनु या मीन राशि में प्रवेश करता है तो इस अवधि को खरमास कहा जाता है। इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यों को शुभ नहीं माना जाता।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा भी इस परंपरा को ध्यान में रखते हुए फिलहाल पूर्णकालिक अध्यक्ष का एलान नहीं करना चाहती थी। राष्ट्रीय अध्यक्ष का चयन पार्टी का सबसे बड़ा और अहम संगठनात्मक फैसला होता है, जिसे भाजपा किसी शुभ मुहूर्त में करना चाहती है। इसी कारण खरमास शुरू होने से ठीक पहले कार्यकारी अध्यक्ष की घोषणा कर दी गई, ताकि मकर संक्रांति के बाद किसी शुभ समय में पूर्ण अध्यक्ष का एलान किया जा सके।

राजनीतिक रणनीति का पहलू

इस फैसले का एक स्पष्ट राजनीतिक पक्ष भी है। अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी से मुक्त होने के बाद जेपी नड्डा अब पूरी तरह चुनावी रणनीतियों पर ध्यान दे सकेंगे। पश्चिम बंगाल, बिहार और अन्य चुनावी राज्यों में पार्टी को मजबूत करना अब उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी मानी जा रही है। वहीं संगठन का दैनिक कामकाज, समन्वय और निर्णय प्रक्रिया अब नितिन नवीन के हाथों में रहेगी।

भाजपा में पहले भी हो चुका है ऐसा

यह पहली बार नहीं है जब भाजपा ने खरमास के कारण कोई बड़ा फैसला टाला हो। पार्टी पहले भी कई अहम राजनीतिक निर्णय ज्योतिषीय गणनाओं को ध्यान में रखकर लेती रही है।

वर्ष 2017 में विधानसभा चुनावों के लिए उम्मीदवारों की सूची तैयार होने के बावजूद खरमास के चलते उसका एलान रोक दिया गया था।

16 जनवरी को शुभ मुहूर्त में सूची जारी की गई।

इसी तरह 2023-24 के लोकसभा चुनावों से पहले भी उम्मीदवार चयन और चुनावी रणनीतियों को खरमास के बाद तेज किया गया था।

कार्यकारी से पूर्ण अध्यक्ष बनने की परंपरा

भाजपा के इतिहास में अब तक 11 राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके हैं। इनमें से केवल दो ऐसे नेता हैं, जिन्हें पहले कार्यकारी अध्यक्ष और बाद में पूर्णकालिक अध्यक्ष बनाया गया।
पहला नाम जना कृष्णमूर्ति का है, जिन्हें 2001 में बंगारू लक्ष्मण के इस्तीफे के बाद कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया और बाद में पूर्ण अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई।
दूसरा उदाहरण जेपी नड्डा स्वयं हैं, जिन्हें 2019 में अमित शाह के गृह मंत्री बनने के बाद कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया गया और 2020 में वे पूर्ण अध्यक्ष बने।

नितिन नवीन के लिए मजबूत संकेत

इन उदाहरणों को देखते हुए राजनीतिक संकेत यही हैं कि खरमास के बाद नितिन नवीन को ही भाजपा का पूर्णकालिक राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जा सकता है। हालांकि अंतिम फैसला पार्टी के संसदीय बोर्ड और शीर्ष नेतृत्व ही करेगा, लेकिन फिलहाल कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिलना यह साफ संकेत देता है कि भाजपा नेतृत्व का भरोसा नितिन नवीन पर है।

कुल मिलाकर, भाजपा का यह कदम न केवल परंपरा और ज्योतिष से जुड़ा है, बल्कि इसके पीछे संगठनात्मक संतुलन और आगामी चुनावों की रणनीति भी स्पष्ट रूप से झलकती है। अब सभी की नजरें 14 जनवरी के बाद होने वाले अगले बड़े एलान पर टिकी हैं।

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