पश्चिम बंगाल में आज पेश हो सकता है यूसीसी बिल, भाजपा अपने सबसे बड़े चुनावी वादे को दे सकती है अमलीजामा; टीएमसी ने छेड़ा विरोध का बिगुल

कोलकाता, 29 जून। पश्चिम बंगाल की राजनीति में सोमवार का दिन बेहद अहम माना जा रहा है। भाजपा सरकार आज विधानसभा में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक पेश कर सकती है। यदि ऐसा होता है तो यह राज्य में सत्ता संभालने के बाद भाजपा द्वारा उठाया गया सबसे बड़ा वैचारिक और राजनीतिक कदम होगा। विधानसभा चुनाव के दौरान किए गए प्रमुख चुनावी वादों में शामिल यूसीसी को सरकार छह महीने के भीतर लागू करने का संकल्प लेकर जनता के बीच गई थी, लेकिन सत्ता में आने के करीब दो महीने के भीतर ही इस दिशा में पहल कर उसने अपने इरादे स्पष्ट कर दिए हैं।

शादी, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने के लिए समान कानून का प्रस्ताव; विधानसभा में भाजपा-टीएमसी के बीच तीखे टकराव के आसार

प्रस्तावित विधेयक का उद्देश्य विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, विरासत, संपत्ति के बंटवारे और गोद लेने जैसे नागरिक मामलों में सभी धर्मों के लिए एक समान कानूनी व्यवस्था लागू करना है। वर्तमान में इन विषयों पर अलग-अलग धार्मिक समुदायों के व्यक्तिगत कानून लागू होते हैं। सरकार का तर्क है कि समान नागरिक संहिता लागू होने से सभी नागरिकों के लिए कानून के समक्ष समानता सुनिश्चित होगी तथा नागरिक अधिकारों में एकरूपता आएगी।

भाजपा के संकल्प पत्र का प्रमुख वादा

विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने अपने संकल्प पत्र में स्पष्ट घोषणा की थी कि सरकार बनने के छह महीने के भीतर पश्चिम बंगाल में यूसीसी लागू किया जाएगा। उस समय केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि समान नागरिक संहिता संविधान की मूल भावना के अनुरूप सभी नागरिकों को समान अधिकार देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगी। अब सरकार उसी वादे को अपेक्षा से पहले पूरा करने की तैयारी में दिखाई दे रही है।

विधानसभा में पहला बड़ा वैचारिक संघर्ष

यूसीसी विधेयक के विधानसभा में आते ही भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच तीखा राजनीतिक और वैचारिक संघर्ष देखने को मिल सकता है। माना जा रहा है कि पूरा बजट सत्र इसी मुद्दे के इर्द-गिर्द केंद्रित रहेगा। भाजपा इसे संवैधानिक समानता और सुशासन का कदम बता रही है, जबकि विपक्ष इसे सामाजिक विविधता और संवैधानिक संतुलन से जुड़ा संवेदनशील विषय मान रहा है।

शुभेंदु अधिकारी ने दिए स्पष्ट संकेत

विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे और अब सरकार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे शुभेंदु अधिकारी ने पहले ही संकेत दे दिए थे कि सरकार मौजूदा सत्र में यूसीसी विधेयक लाएगी। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार उत्तराखंड, गुजरात और असम में निर्धारित प्रक्रिया के तहत समान नागरिक संहिता लागू की गई, उसी प्रकार पश्चिम बंगाल में भी इसे लागू किया जाएगा। उनके अनुसार सरकार अपने प्रमुख चुनावी वादों को प्राथमिकता के आधार पर पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है।

आदिवासी समुदाय रहेगा दायरे से बाहर

राज्य भाजपा अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य ने स्पष्ट किया है कि संविधान के अनुच्छेद 366(25) और अनुच्छेद 342 के तहत मान्यता प्राप्त अनुसूचित जनजातियों को प्रस्तावित कानून के दायरे से बाहर रखा जाएगा। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की परंपराओं, रीति-रिवाजों और विशेष संवैधानिक अधिकारों में कोई हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा।

भट्टाचार्य ने उन आशंकाओं को भी खारिज किया जिनमें यूसीसी को परिवार के आकार या जनसंख्या नियंत्रण से जोड़कर देखा जा रहा था। उनका कहना है कि ऐसे किसी प्रावधान का प्रस्तावित विधेयक से कोई संबंध नहीं है।

सरकार का दावा—समानता का संवैधानिक मॉडल

राज्य सरकार का कहना है कि यूसीसी किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं बल्कि नागरिक कानूनों में समानता स्थापित करने का प्रयास है। सरकार के अनुसार अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के कारण उत्पन्न कानूनी असमानताओं को समाप्त कर सभी नागरिकों के लिए एक समान अधिकार और दायित्व सुनिश्चित करना ही इस कानून का उद्देश्य है।

टीएमसी ने किया कड़ा विरोध

दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस ने विधेयक का पुरजोर विरोध करने की रणनीति तैयार कर ली है। पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पार्टी विधायकों और वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठक कर विधानसभा के भीतर और बाहर इस प्रस्ताव का विरोध करने के निर्देश दिए हैं।

टीएमसी का कहना है कि यूसीसी केवल कानूनी नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी अत्यंत संवेदनशील विषय है। पार्टी का आरोप है कि सरकार व्यापक सामाजिक सहमति और विभिन्न समुदायों से परामर्श किए बिना इतने बड़े बदलाव को लागू करना चाहती है।

टीएमसी के वरिष्ठ नेताओं का आरोप है कि भाजपा इस विधेयक का उपयोग कानूनी सुधार से अधिक राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए कर रही है। उनका कहना है कि व्यक्तिगत कानूनों में बदलाव जैसे विषय पर सभी पक्षों से व्यापक चर्चा आवश्यक है।

विपक्ष ने जल्दबाजी पर उठाए सवाल

विपक्षी नेताओं का कहना है कि यूसीसी जैसे व्यापक प्रभाव वाले कानून को जल्दबाजी में पारित नहीं किया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि विवाह, परिवार, उत्तराधिकार और धार्मिक परंपराओं से जुड़े विषय समाज के विभिन्न वर्गों को प्रभावित करते हैं, इसलिए व्यापक विमर्श के बाद ही ऐसा कानून लाया जाना चाहिए।

दो और महत्वपूर्ण विधेयक भी होंगे पेश

यूसीसी के अलावा सरकार सोमवार को दो अन्य महत्वपूर्ण विधेयक भी विधानसभा में पेश कर सकती है। इनमें पश्चिम बंगाल सार्वजनिक सुरक्षा एवं असामाजिक गतिविधियों पर नियंत्रण विधेयक, 2026 तथा पश्चिम बंगाल सार्वजनिक व्यवस्था रखरखाव (संशोधन) विधेयक, 2026 शामिल हैं।

सरकार का दावा है कि इन कानूनों के जरिए संगठित अपराध, जबरन वसूली, सार्वजनिक अव्यवस्था, तोड़फोड़ और सरकारी कर्मचारियों पर हमलों जैसी घटनाओं पर प्रभावी नियंत्रण लगाया जाएगा। प्रस्तावित कानून में सार्वजनिक सुरक्षा के लिए खतरा माने जाने वाले व्यक्तियों को एक वर्ष तक निवारक हिरासत में रखने तथा अपराध से हुए नुकसान की भरपाई के लिए उनकी संपत्ति जब्त कर नीलाम करने का भी प्रावधान किया गया है।

राजनीतिक दृष्टि से बेहद अहम होगा सत्र

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यूसीसी विधेयक केवल एक कानूनी प्रस्ताव नहीं बल्कि पश्चिम बंगाल की नई सरकार की वैचारिक दिशा का भी संकेत होगा। भाजपा इसे अपने चुनावी एजेंडे की पूर्ति और संवैधानिक समानता की दिशा में ऐतिहासिक कदम के रूप में पेश कर रही है, जबकि टीएमसी इसे सामाजिक विविधता और संघीय मूल्यों पर प्रभाव डालने वाला मुद्दा बता रही है। ऐसे में विधानसभा का मौजूदा सत्र राज्य की राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण और विवादास्पद सत्रों में से एक साबित हो सकता है।

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