यूपी पंचायत चुनाव: 26 साल पुराने हाईकोर्ट के फैसले की अनदेखी सरकार पर पड़ी भारी, प्रधानों को प्रशासक बनाने पर कानूनी संकट गहराया

लखनऊ, 29 जून। उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर योगी सरकार एक बड़े कानूनी संकट में घिर गई है। ग्राम प्रधानों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद उन्हें प्रशासक बनाए जाने की सरकारी व्यवस्था पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि जिस कानूनी प्रावधान के आधार पर यह आदेश जारी किया गया, उसे वर्ष 2000 में ही असंवैधानिक घोषित किया जा चुका है। अदालत ने राज्य सरकार से 13 जुलाई तक पंचायत चुनाव कराने की स्पष्ट समय-सीमा प्रस्तुत करने को कहा है और यह भी पूछा है कि जब संबंधित प्रावधान पहले ही असंवैधानिक घोषित हो चुका था तो उसी के आधार पर दोबारा आदेश कैसे जारी कर दिया गया।

हाईकोर्ट ने कहा- असंवैधानिक प्रावधान के तहत जारी आदेश ‘शून्य’, 13 जुलाई तक चुनाव की समयसीमा बताने के निर्देश

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ में हुई। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में अनिश्चितकाल तक कार्य करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। यदि राज्य सरकार निर्धारित समय तक संतोषजनक जवाब नहीं देती है तो संबंधित अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होना पड़ सकता है।

1994 में जोड़ा गया था विवादित प्रावधान

पूरा विवाद उत्तर प्रदेश पंचायतीराज अधिनियम, 1947 की धारा 12(3-ए) से जुड़ा है। वर्ष 1994 में इस उपधारा को जोड़ते हुए प्रावधान किया गया था कि यदि अपरिहार्य परिस्थितियों या लोकहित में पंचायत चुनाव समय पर कराना संभव न हो तो ग्राम पंचायत के कार्यों के संचालन के लिए प्रशासक अथवा प्रशासनिक समिति नियुक्त की जा सकती है। इसी प्रावधान के आधार पर सरकार ने ग्राम प्रधानों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद उन्हें प्रशासक नियुक्त किया।

वर्ष 2000 में ही हाईकोर्ट ने कर दिया था असंवैधानिक घोषित

कानूनी जानकारों के अनुसार, वर्ष 2000 में इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने प्रेम लाल पटेल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में धारा 12(3-ए) को संविधान के अनुच्छेद 243(ई) और 243(के) के विपरीत मानते हुए असंवैधानिक घोषित कर दिया था। अदालत ने स्पष्ट कहा था कि पंचायतों का कार्यकाल पांच वर्ष से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता और चुनाव टालने के लिए इस प्रावधान का इस्तेमाल संविधान की भावना के खिलाफ है।

यहीं हुई सबसे बड़ी चूक

सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि हाईकोर्ट के फैसले के बाद भी राज्य सरकार ने न तो संबंधित उपधारा को अधिनियम से हटाया और न ही फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर की। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इनमें से कोई एक कदम भी समय रहते उठा लिया जाता तो आज यह संवैधानिक विवाद खड़ा नहीं होता।

यही कारण है कि पिछले 26 वर्षों के दौरान कई बार ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त किए जाने के बावजूद इस व्यवस्था की वैधता पर अब फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

सरकार का पक्ष क्या है

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण तय करने के लिए आयोग गठित किया गया है। आयोग की रिपोर्ट आने तक पंचायत चुनाव कराना संभव नहीं है क्योंकि आरक्षण निर्धारण चुनाव प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा है।

हालांकि अदालत ने इस दलील पर भी सवाल उठाए और पूछा कि आयोग का गठन सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत हुआ था, फिर भी अब तक रिपोर्ट क्यों प्रस्तुत नहीं की गई।

राज्य निर्वाचन आयोग ने क्या कहा

मामले में राज्य निर्वाचन आयोग ने अदालत को बताया कि मतदाता सूची 10 जून को प्रकाशित की जा चुकी है और आयोग चुनाव कराने के लिए पूरी तरह तैयार है। आयोग ने कहा कि चुनाव कराने में बाधा केवल राज्य सरकार की ओर से आवश्यक प्रशासनिक और अन्य व्यवस्थाएं पूरी न होने के कारण आ रही है।

13 जुलाई की सुनवाई होगी अहम

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है, जिसमें ओबीसी आयोग की रिपोर्ट की स्थिति और पंचायत चुनाव कराने की निश्चित समय-सीमा बतानी होगी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि संतोषजनक जवाब नहीं मिला तो संबंधित अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होना पड़ेगा।

क्या होंगे राजनीतिक और प्रशासनिक असर

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अदालत का रुख इसी तरह सख्त बना रहता है तो सरकार के लिए पंचायत चुनाव को और टालना आसान नहीं होगा। साथ ही ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए रखने की वर्तमान व्यवस्था भी कानूनी चुनौती के घेरे में आ सकती है। ऐसे में अब सरकार की अगली रणनीति, ओबीसी आयोग की रिपोर्ट और 13 जुलाई को होने वाली सुनवाई पूरे पंचायत चुनाव कार्यक्रम की दिशा तय करेगी।

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