बिजली उपभोक्ताओं से 14 माह तक गलत अधिभार वसूली का खुलासा, नियामक आयोग ने यूपीपीसीएल को लगाई फटकार

लखनऊ, 24 जून। उत्तर प्रदेश में करोड़ों बिजली उपभोक्ताओं से पिछले 14 महीनों से कथित रूप से गलत तरीके से ईंधन एवं विद्युत क्रय समायोजन अधिभार (एफपीपीसीए) वसूले जाने का मामला सामने आया है। उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट कहा है कि पावर कॉरपोरेशन द्वारा एफपीपीसीए की गणना के लिए अपनाया गया तरीका नियमों के अनुरूप नहीं था और भविष्य में इस प्रकार की वसूली नहीं की जानी चाहिए।

यह मामला उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद द्वारा आयोग में दाखिल लोक महत्व प्रस्ताव के बाद सामने आया। जून माह में बिजली बिलों पर लगाए गए 10 प्रतिशत एफपीपीसीए अधिभार को चुनौती देते हुए परिषद ने आयोग का दरवाजा खटखटाया था। सुनवाई के दौरान आयोग द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब में उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (यूपीपीसीएल) ने स्वीकार किया कि पिछले 14 माह से एफपीपीसीए की गणना एक विशेष फार्मूले के आधार पर की जा रही थी और जून माह में भी उसी पद्धति का उपयोग किया गया।

आयोग की द्विसदस्यीय पीठ ने अपने आदेश में कहा कि एफपीपीसीए की मासिक गणना केवल संबंधित माह की वास्तविक विद्युत खरीद लागत और ट्रांसमिशन शुल्क के आधार पर ही की जा सकती है। किसी अन्य माह की देनदारी, समायोजन या अतिरिक्त खर्च को इसमें शामिल करना नियमों के विपरीत है। आयोग ने पावर कॉरपोरेशन को भविष्य में कानून की निर्धारित परिधि में रहकर कार्य करने की हिदायत देते हुए कड़ी फटकार भी लगाई।

आयोग के इस फैसले के बाद सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि यदि पिछले 14 महीनों तक गलत फार्मूले से अधिभार वसूला गया, तो उपभोक्ताओं से ली गई अतिरिक्त राशि की भरपाई कैसे होगी। उपभोक्ता संगठनों का कहना है कि आयोग को केवल जून माह की गणना तक सीमित न रहकर पूरे 14 माह की एफपीपीसीए गणना की समीक्षा करनी चाहिए, ताकि उपभोक्ताओं को उनका उचित लाभ वापस मिल सके।

उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष एवं राज्य सलाहकार समिति के सदस्य अवधेश कुमार वर्मा ने कहा कि आयोग के समक्ष रखे गए तथ्यों से यह स्पष्ट हो गया है कि एक वर्ष से अधिक समय तक उपभोक्ताओं पर अनावश्यक आर्थिक बोझ डाला गया। उन्होंने मांग की कि पूरे मामले में जिम्मेदारी तय की जाए और यह भी जांच हो कि गलत गणना पद्धति लागू होने के बावजूद इसे इतने लंबे समय तक जारी क्यों रखा गया।

वर्मा ने कहा कि यदि संबंधित अधिकारियों को एफपीपीसीए लागू करने की सही प्रक्रिया की जानकारी नहीं थी तो यह गंभीर प्रशासनिक चूक है और इसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। उन्होंने प्रदेश सरकार से पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन और ऊर्जा विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की समीक्षा करने की मांग की।

उपभोक्ता परिषद ने यह भी कहा है कि वह जल्द ही विद्युत नियामक आयोग के अध्यक्ष से मुलाकात कर पूरे 14 माह की एफपीपीसीए गणना की विस्तृत जांच और पुनर्मूल्यांकन की मांग करेगी। परिषद का कहना है कि अतिरिक्त वसूली गई राशि को किसी न किसी रूप में उपभोक्ताओं को वापस किया जाना चाहिए, ताकि करोड़ों बिजली उपभोक्ताओं के साथ न्याय हो सके।

नियामक आयोग के इस फैसले ने प्रदेश की बिजली व्यवस्था और अधिभार निर्धारण प्रक्रिया पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आयोग और सरकार उपभोक्ताओं से हुई कथित अतिरिक्त वसूली की भरपाई के लिए आगे क्या कदम उठाते हैं।

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