काठमांडू। नेपाल की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। देश के गृहमंत्री सूदन गुरुंग ने पद संभालने के महज 26 दिन के भीतर ही इस्तीफा दे दिया है। उनके इस फैसले के पीछे शेयर निवेश से जुड़े विवाद और वित्तीय पारदर्शिता को लेकर उठे सवालों को मुख्य कारण माना जा रहा है।
गुरुंग ने अपने इस्तीफे में कहा कि वे चाहते हैं कि उनके खिलाफ लगे आरोपों की निष्पक्ष जांच हो और उनके पद पर बने रहने से किसी प्रकार का हितों का टकराव न दिखाई दे। उन्होंने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता और जवाबदेही सर्वोपरि है, इसलिए उन्होंने नैतिक आधार पर पद छोड़ने का निर्णय लिया।
अपने बयान में गुरुंग ने कहा, “मेरे लिए पद से बड़ा नैतिकता का सवाल है और जनविश्वास से बड़ी कोई शक्ति नहीं होती।” उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि हाल के दिनों में उनके शेयर निवेश और अन्य वित्तीय मामलों को लेकर उठे सवालों को उन्होंने गंभीरता से लिया है। साथ ही, देश में युवाओं—विशेषकर जेन-जी—द्वारा पारदर्शिता और जवाबदेही की बढ़ती मांग ने भी उनके इस निर्णय को प्रभावित किया।
गौरतलब है कि सूदन गुरुंग पर अपनी संपत्ति से जुड़ी जानकारी छिपाने के आरोप लगे थे। आरोप था कि उन्होंने कुछ कंपनियों में किए गए निवेश का विवरण अपनी आधिकारिक संपत्ति घोषणा में शामिल नहीं किया। इसके अलावा उन पर एक ऐसे कारोबारी से आर्थिक लेनदेन का भी आरोप लगा, जो मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में जांच के दायरे में है।
मामला तब और गंभीर हो गया जब उनका नाम विवादित कारोबारी दीपक भट्टा के साथ जुड़ा। भट्टा को 1 अप्रैल को मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों में गिरफ्तार किया गया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, गुरुंग ने ‘लिबर्टी माइक्रो लाइफ इंश्योरेंस’ और ‘स्टार माइक्रो इंश्योरेंस’ कंपनियों में निवेश किया था, जिनका संबंध भट्टा और जगदंबा ग्रुप से बताया जा रहा है। आरोप है कि उन्होंने इन कंपनियों में हजारों शेयर खरीदे, लेकिन इसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की।
इसके अलावा यह भी आरोप सामने आया कि उनके बैंक खाते में कुछ व्यक्तियों द्वारा करीब 60 लाख रुपये जमा कराए गए, जिनका इस्तेमाल शेयर खरीदने में किया गया। इससे उनके धन के स्रोत और वित्तीय लेनदेन की पारदर्शिता पर सवाल उठे।
हालांकि, गुरुंग ने अपनी सफाई में कहा कि उनका निवेश पूरी तरह पारदर्शी है। उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने संबंधित कंपनियों में लगभग 50 लाख रुपये का निवेश किया था, लेकिन यह भी कहा कि यदि कोई व्यक्ति संपत्ति छिपाना चाहता है, तो वह इतने बड़े निवेश को सार्वजनिक रूप से नहीं दिखाता। उनके अनुसार, यह केवल संपत्ति को सही तरीके से वर्गीकृत न कर पाने की त्रुटि हो सकती है, न कि जानबूझकर कुछ छिपाने का प्रयास।
इस बीच, यह घटनाक्रम बालेन शाह के नेतृत्व वाली सरकार के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। इससे पहले 9 अप्रैल को श्रम, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा मंत्री दीपक कुमार शाह को भी पद से हटाया गया था, जिन पर पद के दुरुपयोग और अपनी पत्नी को सरकारी पद पर बनाए रखने का आरोप लगा था।
लगातार हो रहे विवादों और इस्तीफों ने सरकार की छवि और स्थिरता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जहां कुछ लोग गुरुंग के इस्तीफे को नैतिक जिम्मेदारी का उदाहरण मान रहे हैं, वहीं विपक्ष इसे सरकार की विफलता करार दे रहा है। जनता के बीच भी इस मुद्दे को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
