कोलकाता, 31 मार्च (UNS)। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लिखे कड़े शब्दों वाले पत्र में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर आरोप लगाया कि वह ‘फॉर्म 6’ आवेदनों के जरिए राज्य के बाहर के लोगों को पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची में बड़ी संख्या में गैर-कानूनी तरीके से शामिल कराने की कोशिश कर रही है।
ममता बनर्जी ने इसे भाजपा द्वारा निर्वाचन आयोग के साथ मिलकर लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों में दखल देने का एक सुनियोजित प्रयास करार दिया। उन्होंने कहा कि उन्हें विश्वसनीय जानकारी मिली है कि भाजपा के एजेंट बड़ी संख्या में ‘फॉर्म 6’ के आवेदन मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय और विभिन्न जिलों में जमा कर रहे हैं।
यह पत्र तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी द्वारा सोमवार को लगाए गए आरोपों के 24 घंटे के भीतर भेजा गया है। अभिषेक बनर्जी ने दावा किया था कि भाजपा ने एक ही दिन में लगभग 30,000 ‘फॉर्म 6’ जमा किए हैं, ताकि दूसरे राज्यों के निवासियों को पश्चिम बंगाल का मतदाता बनाया जा सके।
ममता बनर्जी ने कहा कि ये आवेदन सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा नहीं लगते, बल्कि मतदाता सूची में गैर-निवासियों को शामिल करने की एक शरारतपूर्ण चाल प्रतीत होते हैं। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त से अनुरोध किया कि 28 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने के बाद नाम शामिल कराने के ऐसे किसी भी आवेदन पर विचार न किया जाए।
मुख्यमंत्री ने अपने पत्र में आशंका जताई कि इन आवेदनों से जुड़े कई लोग राज्य के वास्तविक निवासी नहीं हो सकते और उनका पश्चिम बंगाल से कोई वैध संबंध नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि बिहार, हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली में चुनावों से पहले भी इसी तरह की घटनाएं देखने को मिली थीं।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि ये आरोप सही साबित होते हैं, तो यह गैर-कानूनी, असंवैधानिक और बुनियादी तौर पर अलोकतांत्रिक कृत्य होगा, जिससे लोकतांत्रिक व्यवस्था की पारदर्शिता और मतदाताओं के अधिकारों पर गंभीर असर पड़ सकता है।
आदर्श आचार संहिता लागू होने के मद्देनजर ममता बनर्जी ने यह पत्र मुख्यमंत्री के बजाय तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष के लेटरहेड पर भेजा। उन्होंने उच्चतम न्यायालय के 20 फरवरी के आदेश का उल्लेख करते हुए कहा कि अंतिम मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने से जुड़े मामलों की जांच केवल न्यायिक अधिकारियों द्वारा की जानी चाहिए और किसी प्रशासनिक अधिकारी द्वारा लिया गया फैसला शीर्ष अदालत के आदेश के दायरे से बाहर होगा।
