इच्छा-मृत्यु को उच्चतम न्यायालय की मंजूरी: जिम और फुटबॉल के शौकीन थे हरीश राणा

नई दिल्ली, 11 मार्च ।उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को 30 वर्षीय हरीश राणा को ‘निष्क्रिय इच्छा-मृत्यु’ की अनुमति दी। अदालत के इस निर्णय के साथ ही 13 वर्षों से कोमा में पड़े राणा के जीवन-रक्षक उपचार को बंद करने की अनुमति मिल गई।

परिजनों और दोस्तों के अनुसार, हरीश राणा जिम और फुटबॉल के बेहद शौकीन थे। वह वर्ष 2013 में पंजाब विश्वविद्यालय से बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे और उसी दौरान जिस मकान में वह पीजी (सशुल्क अतिथि) के तौर पर रह रहे थे, उसकी चौथी मंजिल से गिर गए थे। इस हादसे में उनके मस्तिष्क में गंभीर चोट आई और वह कोमा में चले गए।

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के मूल निवासी राणा के साथ यह दुर्घटना 20 अगस्त 2013 को हुई थी। तीन भाई-बहनों में सबसे बड़े राणा को पहले स्थानीय अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उनकी गंभीर स्थिति को देखते हुए कुछ ही घंटों में उन्हें पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (पीजीआईएमईआर), चंडीगढ़ भेज दिया गया।

राणा 21 अगस्त से 27 अगस्त 2013 तक पीजीआईएमईआर में भर्ती रहे। इस दौरान उन्हें एंटिएपिलेप्टिक दवाएं, दर्द निवारक दवाएं, वेंटिलेशन सपोर्ट, एंटीबायोटिक्स, ट्रेकियोस्टॉमी और राइल्स ट्यूब के जरिए पोषण जैसी संरक्षणात्मक चिकित्सा दी गई। हालांकि बाद में उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई, लेकिन उनकी सेहत में कोई खास सुधार नहीं हुआ।

इसके बाद उनकी नाजुक हालत के कारण उन्हें कई बार अस्पताल में भर्ती होना पड़ा और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली के जय प्रकाश नारायण ट्रॉमा सेंटर में सिर की चोट, दौरे, निमोनिया और बेडसोर जैसी समस्याओं के लिए नियमित इलाज कराया गया।

राणा के भाई आशीष राणा ने बताया कि दुर्घटना से पहले दोनों भाई साथ में फुटबॉल खेलते और वीडियो गेम खेला करते थे। परिवार और दोस्तों ने कहा कि वह बेहद ऊर्जावान, शारीरिक रूप से सक्रिय और खेलों में गहरी रुचि रखने वाले युवा थे।

अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि किसी से प्रेम करना केवल खुशियों के समय उसकी परवाह करना नहीं है, बल्कि उसके सबसे कठिन और अंधकारमय क्षणों में भी उसका साथ देना है। न्यायालय ने हरीश राणा के माता-पिता और भाई-बहनों की सराहना की, जिन्होंने लंबे समय तक उनकी देखभाल में अटूट समर्पण दिखाया।

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