लखनऊ, 18 फरवरी — राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने पश्चिमी देशों पर ‘जड़वाद’ फैलाने का आरोप लगाते हुए कहा कि शक्ति-केन्द्रित सोच आज वैश्विक तनावों की प्रमुख वजह बन रही है। उन्होंने कहा कि यदि भारत को ‘विश्व गुरु’ बनना है तो उसे हर क्षेत्र में सक्षम और शक्तिशाली बनना होगा।
लखनऊ विश्वविद्यालय के मालवीय सभागार में आयोजित शोधार्थी संवाद कार्यक्रम में भागवत ने वैश्वीकरण की मौजूदा दिशा पर चिंता जताई। उनके अनुसार आज वैश्वीकरण का अर्थ व्यापक मानवीय सहयोग के बजाय बाजारीकरण तक सीमित हो गया है, जो समाज के लिए दीर्घकालिक रूप से हानिकारक हो सकता है। उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों की विचारधारा में बलशाली बनकर स्वयं आगे बढ़ने और बाधाओं को समाप्त करने की प्रवृत्ति दिखती है, और इसी मानसिकता के उदाहरण के रूप में उन्होंने अमेरिका और चीन का उल्लेख किया।
भागवत ने शिक्षा और स्वास्थ्य के बढ़ते व्यवसायीकरण पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि ये मूलभूत आवश्यकताएं हैं और इन्हें लाभ के साधन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने सभी के लिए सुलभ और समावेशी व्यवस्था पर जोर दिया। भारतीय शिक्षा व्यवस्था के ऐतिहासिक संदर्भ में उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक काल में पारंपरिक प्रणाली को कमजोर किया गया, जिसे सुधारने की आवश्यकता है।
उन्होंने शोध की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए छात्रों और शोधार्थियों से आग्रह किया कि वे प्रामाणिक, उत्कृष्ट और राष्ट्रहित में उपयोगी अनुसंधान करें। उनके अनुसार देश की दिशा और दशा बदलने में शोध और बौद्धिक विमर्श की निर्णायक भूमिका होती है। भागवत ने कहा कि संगठन को समझने के लिए उसे निकट से देखना और अनुभव करना आवश्यक है, क्योंकि केवल बाहरी धारणाओं से किसी संस्था का सही आकलन संभव नहीं है।
कार्यक्रम के दौरान उन्होंने यह भी कहा कि संगठन का उद्देश्य समाज को संगठित करना है और वह किसी के विरोध में कार्य नहीं करता। उन्होंने धर्म को समाज को संतुलित और कल्याणकारी दिशा देने वाले सिद्धांतों का समुच्चय बताया।
इस कार्यक्रम के समानांतर भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन के सदस्यों ने विश्वविद्यालय परिसर के बाहर विरोध प्रदर्शन किया। संगठन के पदाधिकारियों ने संघ की विचारधारा पर सवाल उठाते हुए कार्यक्रम का विरोध किया। पुलिस के अनुसार कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कुछ प्रदर्शनकारियों को एहतियातन हिरासत में लिया गया और बाद में छोड़ दिया गया।
भागवत के इस संबोधन को वैचारिक बहस के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है, जिसमें वैश्वीकरण, शिक्षा, शक्ति-संतुलन और भारत की वैश्विक भूमिका जैसे मुद्दों पर चर्चा तेज होने की संभावना है।
