पुलिस व्यवस्था में हस्तक्षेप से इनकार, दिल्ली उच्च न्यायालय ने जनहित याचिका खारिज की

नई दिल्ली, 18 फरवरी — दिल्ली उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय राजधानी के प्रत्येक पुलिस थाने में गुमशुदा व्यक्तियों के मामलों के लिए अलग प्रकोष्ठ बनाने संबंधी जनहित याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि पुलिस व्यवस्था का संचालन पुलिस अधिकारियों के विवेक पर ही छोड़ा जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि पुलिस संगठन के कार्य संचालन के तरीके पर निर्देश देना न्यायालय का दायित्व नहीं है।

मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने आनंद लीगल एड फोरम ट्रस्ट द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए कहा कि इसमें व्यापक राहत की मांग की गई है, लेकिन ऐसा कोई ठोस उदाहरण प्रस्तुत नहीं किया गया जिसमें पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज करने से इनकार किया हो। पीठ ने टिप्पणी की कि केवल मीडिया रिपोर्टों के आधार पर याचिका दायर करना पर्याप्त नहीं है।

याचिका में सभी लापता व्यक्तियों के मामलों में प्राथमिकी दर्ज करने, उनकी जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो से कराने और गुमशुदगी की बढ़ती घटनाओं की जांच के लिए संयुक्त कार्यबल गठित करने का अनुरोध किया गया था। इसके अलावा, ऐसे मामलों की निगरानी के लिए उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक निकाय बनाने की मांग भी की गई थी।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि दिल्ली में लापता व्यक्तियों की संख्या में चिंताजनक वृद्धि हुई है, जो सार्वजनिक चिंता का विषय है। इस पर अदालत ने पूछा कि कितने मामलों में प्राथमिकी दर्ज नहीं हुई और उसका आधिकारिक आंकड़ा क्या है। पीठ ने कहा कि केवल यह मान लेना कि किसी मुद्दे को एक विशेष तरीके से संभाला जाना चाहिए, न्यायिक हस्तक्षेप का आधार नहीं बन सकता।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि पुलिसिंग का ढांचा और प्रशासनिक व्यवस्थाएं पुलिस अधिकारियों के कार्यक्षेत्र में आती हैं, इसलिए प्रत्येक थाने में विशेष प्रकोष्ठ बनाने का निर्णय भी वही लें। अधिकारियों की ओर से पेश वकील ने भी लापता व्यक्तियों के मामलों में कथित वृद्धि के दावे को तथ्यहीन बताया।

हालांकि, अदालत ने एक अन्य जनहित याचिका पर केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया है। इस याचिका में लापता व्यक्तियों की कुल संख्या और उनके संबंध में उठाए गए कदमों की जानकारी देने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है। याचिका में पिछले दशक में करीब 53,000 लापता व्यक्तियों की स्थिति पर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने की मांग भी की गई है।

पीठ ने मामले की अगली सुनवाई अप्रैल में निर्धारित करते हुए संबंधित पक्षों को चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। अदालत के इस रुख को प्रशासनिक कार्यों और न्यायिक सीमाओं के स्पष्ट निर्धारण के रूप में देखा जा रहा है।

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