वंदे मातरम् का अपमान देश के साथ धोखा: योगी आदित्यनाथ, अखिलेश यादव को आरएसएस शाखा जाने की सलाह

लखनऊ, 17 फरवरी (RNN)। योगी आदित्यनाथ ने अखिलेश यादव पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि राष्ट्रीय गीत “वंदे मातरम्” का अपमान देश के साथ धोखा है। उन्होंने सपा प्रमुख को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में जाकर उसकी परंपराओं और अनुशासन को समझने की सलाह दी।

लखनऊ में एक निजी मीडिया समूह के ‘विकसित भारत–समृद्ध उत्तर प्रदेश’ कॉन्क्लेव को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि यदि अखिलेश यादव आरएसएस की शाखाओं में जाएंगे तो अनुशासन और संगठनात्मक कार्यप्रणाली को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् स्वतंत्रता आंदोलन का प्रेरक मंत्र रहा है और संविधान सभा ने 24 जनवरी 1950 को इसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया था।

मुख्यमंत्री ने कहा कि राष्ट्रीय गीत, राष्ट्रगान या तिरंगे का अपमान संविधान निर्माताओं, विशेषकर भीमराव आंबेडकर और स्वतंत्रता संग्राम के उन सेनानियों का अपमान है जिन्होंने वंदे मातरम् का उद्घोष करते हुए बलिदान दिया। उनके अनुसार ऐसे कृत्य देशहित के विरुद्ध हैं और आधुनिक भारत में स्वीकार्य नहीं हो सकते।

यह बयान उस टिप्पणी के जवाब में आया जिसमें अखिलेश यादव ने प्रेस वार्ता के दौरान आरएसएस की भूमिका पर सवाल उठाए थे और कहा था कि संगठन से जुड़े लोगों ने स्वतंत्रता से पहले और बाद में वंदे मातरम् नहीं गाया। उन्होंने राज्य सरकार पर प्रदेश की वास्तविक समस्याओं से दूर रहने का आरोप भी लगाया था।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने समाजवादी पार्टी की आलोचना करते हुए कहा कि जो लोग अपने कार्यकाल में परिवर्तन लाने में असफल रहे, वे अब दुष्प्रचार के माध्यम से विकास को बाधित करने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि 2017 के बाद से उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था, बुनियादी ढांचे और आर्थिक विकास के क्षेत्र में व्यापक बदलाव हुए हैं और राज्य देश की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है।

धार्मिक मामलों और राजनीतिक बयानों से जुड़े प्रश्नों पर मुख्यमंत्री ने कहा कि आस्था के मुद्दों का उपयोग राजनीतिक सुविधा के आधार पर नहीं होना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष के कुछ नेता परिस्थितियों के अनुसार अपने रुख बदलते रहते हैं।

राजनीतिक हलकों में मुख्यमंत्री और सपा प्रमुख के बीच बयानबाजी को आगामी राजनीतिक समीकरणों के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि राष्ट्रीय प्रतीकों, संगठनात्मक विचारधाराओं और विकास के मुद्दों पर यह बहस आने वाले समय में और तेज हो सकती है।

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