आरएसएस किसी के खिलाफ नहीं, सत्ता की इच्छा नहीं रखता: मोहन भागवत

मुंबई, 7 फरवरी । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने स्पष्ट किया है कि आरएसएस न तो किसी के खिलाफ है और न ही सत्ता प्राप्त करने या दबाव समूह बनने की कोई इच्छा रखता है। संघ का एकमात्र उद्देश्य समाज को एकजुट करना और राष्ट्र निर्माण में सकारात्मक भूमिका निभाना है।

आरएसएस के शताब्दी वर्ष के अवसर पर मुंबई के वर्ली स्थित नेहरू सेंटर में आयोजित दो दिवसीय व्याख्यान श्रृंखला ‘संघ की 100 साल की यात्रा : नये क्षितिज’ के उद्घाटन सत्र में भागवत ने कहा कि डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने 1925 में समाज की एकता, अनुशासन और चरित्र निर्माण की आवश्यकता को महसूस करते हुए संघ की स्थापना की थी।

संघ प्रमुख ने कहा कि आरएसएस ने आरंभ में ही यह तय कर लिया था कि समाज के एकीकरण के अतिरिक्त उसका कोई अन्य एजेंडा नहीं होगा। उन्होंने इस धारणा को भी खारिज किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आरएसएस की वजह से सत्ता में हैं। भागवत ने स्पष्ट किया कि राजनीतिक दल एक स्वतंत्र इकाई होते हैं और आरएसएस राजनीति में प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं है।

उन्होंने कहा कि आरएसएस न तो अर्धसैनिक संगठन है और न ही अखाड़ा। पथ संचलन और लाठी जैसे अनुशासनात्मक अभ्यास स्वयंसेवकों के व्यक्तित्व निर्माण के लिए हैं, न कि किसी प्रकार की शक्ति-प्रदर्शन के लिए।

डॉ. हेडगेवार के विचारों पर प्रकाश डालते हुए भागवत ने कहा कि वे मानते थे कि राजनीतिक स्वतंत्रता तो मिल जाएगी, लेकिन यदि समाज की आंतरिक कमजोरियों—जैसे एकता की कमी, अनुशासनहीनता, स्वार्थ, अज्ञान और गरीबी—का समाधान नहीं किया गया, तो देश फिर गुलामी की ओर जा सकता है।

‘हिंदू’ शब्द की व्याख्या करते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि यह कोई संप्रदायवाचक संज्ञा नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक विशेषण है। भारत में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति, उसकी पूजा-पद्धति चाहे जो भी हो, हिंदू सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि भारतीय मुसलमान और ईसाई भी इसी भूमि की जड़ों से जुड़े हैं।

भागवत ने कहा कि आरएसएस आलोचना से नहीं डरता और स्वस्थ व ईमानदार आलोचना समाज के लिए लाभकारी होती है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत का लक्ष्य शक्ति के बल पर विश्व पर प्रभुत्व स्थापित करना नहीं, बल्कि अपने आचरण और उदाहरण के माध्यम से ‘विश्वगुरु’ बनना है।

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