नए यूजीसी नियमों पर रोक: अखिलेश यादव और मायावती ने उच्चतम न्यायालय के फैसले का किया स्वागत

लखनऊ, 29 जनवरी :समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के हाल में अधिसूचित नए नियमों पर उच्चतम न्यायालय द्वारा लगाई गई रोक का बृहस्पतिवार को स्वागत किया। दोनों नेताओं ने इस फैसले को सामाजिक संतुलन और न्याय के हित में बताया।

अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए कहा कि सच्चा न्याय वही है, जिसमें किसी के साथ अन्याय या उत्पीड़न न हो। उन्होंने लिखा,
“सच्चा न्याय किसी के साथ अन्याय नहीं होता है, माननीय न्यायालय यही सुनिश्चित करता है। कानून की भाषा भी साफ होनी चाहिए और भाव भी। बात सिर्फ नियम की नहीं, नीयत की भी होती है।”

सपा अध्यक्ष ने आगे कहा कि किसी भी व्यवस्था का उद्देश्य यह होना चाहिए कि न किसी पर अत्याचार हो, न किसी के साथ अन्याय या जुल्म-ज्यादती की जाए।

इस बीच, बसपा प्रमुख मायावती ने भी उच्चतम न्यायालय के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने ‘एक्स’ पर पोस्ट कर कहा कि यूजीसी द्वारा सरकारी और निजी विश्वविद्यालयों में जातिवादी घटनाओं को रोकने के उद्देश्य से लागू किए गए नए नियमों से देश में सामाजिक तनाव का माहौल बन गया था। ऐसे में मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए शीर्ष अदालत का इस पर रोक लगाने का फैसला उचित है।

मायावती ने कहा,
“अगर यूजीसी इन नियमों को लागू करने से पहले सभी पक्षों को विश्वास में लेती और जांच समितियों में भी ‘प्राकृतिक न्याय’ के सिद्धांत के तहत सभी वर्गों, विशेषकर सवर्ण समुदाय को उचित प्रतिनिधित्व देती, तो देश में इस प्रकार का सामाजिक तनाव पैदा ही नहीं होता।”

गौरतलब है कि उच्चतम न्यायालय ने यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ दायर कई याचिकाओं पर बृहस्पतिवार को सुनवाई करते हुए उनके क्रियान्वयन पर रोक लगा दी। याचिकाओं में आरोप लगाया गया था कि आयोग ने जाति-आधारित भेदभाव की एक गैर-समावेशी परिभाषा अपनाई है और कुछ वर्गों को संस्थागत संरक्षण से बाहर कर दिया गया है।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इन नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी किया है।

उल्लेखनीय है कि ये नए नियम 13 जनवरी को अधिसूचित किए गए थे, जिनके तहत उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव संबंधी शिकायतों की जांच और समानता को बढ़ावा देने के लिए सभी संस्थानों में ‘समानता समितियां’ गठित करना अनिवार्य किया गया था।

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