नयी दिल्ली, 15 जनवरी – निर्वाचन आयोग (ईसी) ने बृहस्पतिवार को उच्चतम न्यायालय को बताया कि वह मतदाता के रूप में पंजीकरण के सीमित उद्देश्य से ही नागरिकता का निर्धारण कर सकता है, लेकिन किसी व्यक्ति को निर्वासित करने या यह तय करने का उसे अधिकार नहीं है कि किसी के पास भारत में रहने का वैध वीजा है या नहीं।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कहा कि निर्वाचन आयोग संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत वयस्क मताधिकार के सिद्धांत को लागू करता है और मतदाता सूची में नाम शामिल करने से पहले आवश्यक संवैधानिक शर्तों की पूर्ति की जांच करना उसका दायित्व है।
द्विवेदी ने दलील दी कि वयस्क मताधिकार के संवैधानिक अर्थ में तीन आवश्यक तत्व शामिल हैं और पंजीकरण के चरण में इन तीनों का पूरा होना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि यदि उचित आधार पर यह पाया जाता है कि कोई व्यक्ति नागरिक नहीं है, फिर भी उसका नाम मतदाता सूची में है, तो यह संविधान के सिद्धांतों के विपरीत होगा।
पीठ बिहार सहित कई राज्यों में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई कर रही है, जिनमें निर्वाचन आयोग की शक्तियों, नागरिकता और मताधिकार से जुड़े संवैधानिक प्रश्न उठाए गए हैं।
याचिकाकर्ता एनजीओ एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि मतदान के लिए नागरिकता पूर्व शर्त है, लेकिन मूल प्रश्न यह है कि क्या निर्वाचन आयोग को नागरिकता निर्धारित करने का अधिकार प्राप्त है।
इस पर प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि आयोग का रुख यह है कि वह नागरिकता का व्यापक निर्णय नहीं कर रहा, बल्कि केवल यह पहचान कर रहा है कि चुनावी उद्देश्य के लिए कोई व्यक्ति वास्तविक नागरिक है या नहीं।
न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की कि आयोग का यह संवैधानिक दायित्व है कि गैर-नागरिकों के नाम मतदाता सूची में शामिल न हों। पीठ ने यह भी कहा कि आयोग नागरिकता प्रदान करने वाला प्राधिकरण नहीं है, लेकिन वह नागरिकता के दावे की सत्यता की जांच कर सकता है।
सुनवाई के दौरान प्रधान न्यायाधीश ने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि यदि आने वाले समय में ऑनलाइन मतदान शुरू हो जाए, तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
मामले की अगली सुनवाई 20 जनवरी को अपराह्न दो बजे होगी।
