मुक्त संवाद का दायरा सिकुड़ रहा है, राजनीति और धर्म ने समाज को निराश किया है: कैलाश सत्यार्थी

कैलाश सत्यार्थी

नयी दिल्ली, 16 जनवरी : नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित और प्रख्यात समाज सुधारक कैलाश सत्यार्थी ने कहा है कि मौजूदा दौर में मानवता और पृथ्वी गंभीर खतरे में हैं, मुक्त संवाद का दायरा लगातार सिकुड़ रहा है और राजनीति व धर्म ने समाज को निराश किया है।

सत्यार्थी ने ये विचार अपनी नई पुस्तक ‘करुणा: द पावर ऑफ कम्पैशन’ में व्यक्त किए हैं, जो हार्पर कॉलिन्स द्वारा प्रकाशित की गई है। पुस्तक में उन्होंने कहा है कि आज के समय में करुणा की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है।

उन्होंने लिखा है कि एक ओर दुनिया के पास पहले से कहीं अधिक संपदा, तकनीकी प्रगति, बाजार, कारोबार और उपभोग की सुविधाएं हैं, लेकिन इसके बावजूद वैश्विक संकट गहराते जा रहे हैं और “दुनिया जल रही है।”

सत्यार्थी ने पुस्तक में लिखा,
“मुक्त संवाद का दायरा सिकुड़ रहा है। शासन, राजनीति, धर्म और अर्थव्यवस्थाओं ने हमें निराश किया है।”

उन्होंने कहा कि आज मौजूद हर संकट तत्काल नई सोच और नई अवधारणाओं की मांग करता है और ऐसे समय में चुप्पी साध लेना विश्वासघात के समान है।

पुस्तक में सत्यार्थी ने तर्क दिया है कि दुनिया के समक्ष खड़े तमाम संकटों का समाधान करुणा में निहित है। उन्होंने लिखा कि करुणा केवल भावना नहीं, बल्कि शक्ति, जिम्मेदारी, साहस और कार्रवाई है।

‘करुणा’ पुस्तक करुणा की शक्ति में निहित असीम संभावनाओं की खोज करती है और यह रेखांकित करती है कि सामाजिक परिवर्तन और आंतरिक बदलाव में करुणा किस प्रकार एक आधारभूत भूमिका निभा सकती है। इस पुस्तक का विमोचन 17 जनवरी को जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (जेएलएफ) में किया जाएगा।

पुस्तक यह भी तर्क देती है कि “करुणा, न्याय, समानता, शांति और स्थिरता का सबसे सुदृढ़ मार्ग है” और ‘करुणा के वैश्वीकरण’ का आह्वान करती है।

सत्यार्थी मूवमेंट फॉर ग्लोबल कम्पैशन के संस्थापक 72 वर्षीय सत्यार्थी ने हाल ही में जारी एक बयान में कहा,
“इस पुस्तक में मैंने एक नई अवधारणा प्रस्तुत की है—‘करुणा लब्धि’। यह व्यक्तियों और संगठनों में करुणा को मापने और बढ़ाने की एक वैज्ञानिक दृष्टि है। आज करुणा कोई विकल्प नहीं, बल्कि मानवता के अस्तित्व के लिए ऑक्सीजन है।”

उन्होंने कहा कि यह पुस्तक लोगों की सोई हुई करुणा को जगाने और उन्हें भीतर से समस्या सुलझाने वाला तथा बदलाव लाने वाला व्यक्तित्व विकसित करने में मदद करेगी।

सत्यार्थी ने पुस्तक में यह भी लिखा कि केवल आध्यात्मिकता आज की चुनौतियों का समाधान नहीं कर सकती। उन्होंने ‘आध्यात्मिक इंजीनियरिंग’ की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि करुणा को उद्देश्य और कर्म में बदलना समय की मांग है।

पुस्तक में यह भी उल्लेख किया गया है कि भारत केवल ताकत या संपदा के बल पर विश्वगुरु नहीं बन सकता। सत्यार्थी लिखते हैं,
“करुणा हमारी विरासत है और सभ्यता की नींव है। यही करुणा भारत को सच्चे अर्थों में विश्वमित्र बना सकती है।”

उन्होंने बुद्धिमत्ता को मापने के पारंपरिक आईक्यू मॉडल को अप्रासंगिक बताते हुए ‘करुणा लब्धि (सीक्यू)’ की अवधारणा प्रस्तुत की है, जिसे व्यक्ति के करुणा स्तर को बढ़ाने और उसके मूल्यांकन का प्रभावी उपकरण बताया गया है।

Related Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *