नेपाल में विरोध से बनी सरकार से असंतुष्ट जेन जेड आंदोलनकारी, वादे पूरे न होने का आरोप

नेपाल में विरोध से बनी सरकार से असंतुष्ट जेन जेड आंदोलनकारी, वादे पूरे न होने का आरोप

काठमांडू, 7 जनवरी । नेपाल में भ्रष्टाचार और कुशासन के खिलाफ हुए जेन जेड आंदोलन के बाद बनी अंतरिम सरकार से अब वही युवा आंदोलनकारी खफा नजर आ रहे हैं, जिनके दबाव में यह सत्ता परिवर्तन हुआ था। आंदोलन में शामिल कई युवा आज यह सवाल उठा रहे हैं कि भारी बलिदानों के बावजूद उन्हें क्या हासिल हुआ।

22 वर्षीय मुकेश आवस्ती इसका सबसे दर्दनाक उदाहरण हैं। सितंबर में ऑस्ट्रेलिया जाकर सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू करने की योजना बनाने वाले आवस्ती भ्रष्टाचार के खिलाफ युवाओं के विद्रोह में शामिल हो गए। हिंसक प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा बलों की गोली लगने से उनकी एक टांग गंवानी पड़ी। काठमांडू के नेशनल ट्रॉमा सेंटर में उनकी टांग काटनी पड़ी। अब वह कहते हैं कि इतने बलिदानों के बावजूद न तो भ्रष्टाचार खत्म हुआ और न ही दोषियों के खिलाफ कार्रवाई हुई।

आठ सितंबर से काठमांडू में शुरू हुए इन हिंसक प्रदर्शनों में 76 लोगों की मौत हो गई और 2,300 से अधिक लोग घायल हुए थे। ‘जेन जेड’ कार्यकर्ताओं के नेतृत्व में हुए आंदोलन के दबाव में 12 सितंबर को उच्चतम न्यायालय की सेवानिवृत्त न्यायाधीश सुशीला कार्की को नेपाल की पहली महिला प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया। उन्होंने मार्च में संसदीय चुनाव कराने का वादा किया था।

जेन जेड उस पीढ़ी को कहा जाता है जो 1997 से 2012 के बीच पैदा हुई है और तकनीक, इंटरनेट व सोशल मीडिया के साथ बड़ी हुई है। देश में बड़े बदलाव की उम्मीद में सड़कों पर उतरे ये युवा अब अंतरिम सरकार की आलोचना कर रहे हैं। उनका कहना है कि न तो भ्रष्टाचार पर ठोस कार्रवाई हुई और न ही प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने वालों को सजा मिली।

आवस्ती का आरोप है कि सरकार की भ्रष्टाचार-रोधी एजेंसी ने अब तक केवल एक बड़ा मामला दर्ज किया है, जिसमें किसी प्रमुख राजनीतिक हस्ती का नाम नहीं है। जिन नेताओं पर आंदोलन के दौरान आरोप लगे थे, वे अब आगामी चुनावों की तैयारी में जुटे हैं। सितंबर के विद्रोह के समय सत्ता में रहे नेताओं के खिलाफ भी कोई मामला दर्ज नहीं हुआ है।

इसी असंतोष के चलते हाल के हफ्तों में दर्जनों प्रदर्शनकारी उसी सरकार के खिलाफ फिर सड़कों पर उतर आए हैं, जो उनके आंदोलन के बाद बनी थी। प्रधानमंत्री कार्यालय के बाहर हुए प्रदर्शनों को पुलिस ने बलपूर्वक तितर-बितर किया। बैसाखी के सहारे चल रहे सुमन बोहरा कहते हैं कि सरकार ने न तो मृतकों के परिवारों की मदद की और न ही घायलों के लिए कुछ किया, इसलिए मजबूरी में फिर प्रदर्शन करना पड़ा।

गौरतलब है कि सितंबर में सोशल मीडिया पर लगे प्रतिबंध से भड़के हजारों युवा काठमांडू में जमा हुए थे। उन्होंने संसद में घुसने की कोशिश की, जिसके बाद सुरक्षा बलों ने गोलियां चलाईं। अगले दिन देशभर में हिंसा फैल गई और गुस्साई भीड़ ने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति कार्यालय, पुलिस थानों और नेताओं के घरों में आग लगा दी। हालात काबू में लाने के लिए सेना तैनात की गई और अंततः बातचीत के बाद अंतरिम सरकार का गठन हुआ।

हालांकि सरकार मार्च में चुनाव कराने के अपने वादे पर कायम है। प्रधानमंत्री सुशीला कार्की का कहना है कि पांच मार्च को होने वाली चुनाव प्रक्रिया पर पूरी दुनिया की नजर है और सरकार इसे सफलतापूर्वक कराने के लिए प्रतिबद्ध है।

वहीं विश्लेषकों का कहना है कि जेन जेड आंदोलन की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी अस्पष्ट मांगें हैं। अलग-अलग समूहों की अलग-अलग मांगें हैं—कोई प्रधानमंत्री के प्रत्यक्ष चुनाव की बात कर रहा है, कोई संविधान खत्म करने की, तो कोई सभी पुराने नेताओं को जेल भेजने की मांग कर रहा है। आंदोलन का न कोई स्पष्ट नेतृत्व है और न ही एक साझा एजेंडा।

काठमांडू के पॉलीगॉन पत्रकारिता एवं जनसंचार महाविद्यालय के प्राचार्य अबीरल थापा के अनुसार, आंदोलन की दिशा और मांगों में स्पष्टता की कमी नेपाल के लिए बड़ी समस्या बन गई है। उनका कहना है कि मार्च में चुनाव होंगे या नहीं, इस पर संदेह बना हुआ है, लेकिन मौजूदा हालात में चुनाव के अलावा कोई और व्यवहारिक विकल्प भी नहीं दिखता।

Related Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *