मायावती ने नववर्ष पर दी शुभकामनाएं, समावेशी विकास और संवैधानिक मूल्यों के पालन का किया आह्वान

मायावती ने नववर्ष पर दी शुभकामनाएं, समावेशी विकास और संवैधानिक मूल्यों के पालन का किया आह्वान

लखनऊ। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की अध्यक्ष एवं उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने नववर्ष 2026 के अवसर पर देशवासियों तथा दुनिया भर में रहने वाले भारतीय नागरिकों को हार्दिक शुभकामनाएं दीं। उन्होंने समाज के सभी वर्गों के लिए सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करने के उद्देश्य से समावेशी विकास, सामाजिक सद्भाव और संवैधानिक मूल्यों के सख्त पालन का आह्वान किया।

नववर्ष के मौके पर जारी एक बयान में मायावती ने कामना की कि नया वर्ष हर नागरिक, विशेषकर समाज के गरीब, हाशिए पर पड़े और मेहनतकश वर्गों के लिए खुशी, शांति, समृद्धि, सुरक्षा और आत्मसम्मान लेकर आए। उन्होंने उम्मीद जताई कि “बहुजन” समुदाय का रोजमर्रा का जीवन आसान होगा और वे लगातार बदलते नियमों, कानूनों और बढ़ती कठिनाइयों के बोझ से मुक्त हो सकेंगे।

बसपा प्रमुख ने कहा कि विकास का वास्तविक लाभ संविधान में निहित कल्याणकारी भावना के अनुरूप सभी जरूरतमंद वर्गों तक पहुंचना चाहिए, न कि वह केवल मुट्ठी भर लोगों तक सीमित रह जाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि असली विकास तभी सार्थक माना जाएगा, जब वह उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में गरीबी, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार को समाप्त करने में सहायक बने।

मायावती ने बहुजन समाज के लिए बेहतर भविष्य सुनिश्चित करने हेतु मजबूत राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष की आवश्यकता पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि चुनाव ऐसी व्यवस्था में नहीं बदलने चाहिए, जहां धनबल और हेरफेर का अत्यधिक प्रभाव हो, क्योंकि यह लोकतंत्र, राष्ट्र और जनता—किसी के भी हित में नहीं है।

उन्होंने कानून के राज को मजबूत बनाए रखने के लिए नफरत और हिंसा फैलाने वाली विभाजनकारी ताकतों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया। साथ ही भारत की वैश्विक भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि संवैधानिक मूल्यों का ईमानदारी से पालन करने से देश विश्व के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में उभरेगा और पड़ोसी देशों के साथ संबंध भी मजबूत होंगे, जिसका प्रत्यक्ष लाभ आम नागरिकों को मिलेगा।

मायावती ने सरकार से अपील की कि बहुजन आबादी को राष्ट्रीय संपत्ति के रूप में देखते हुए उनके विकास में निवेश किया जाए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि नीतियां केवल बड़े उद्योगपतियों और अमीर वर्ग को लाभ पहुंचाने तक सीमित रहीं, तो असमानता लगातार बढ़ती रहेगी और गरीब तबके को सीमित सरकारी सहायता पर निर्भर रहना पड़ेगा।

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