भारतीय संस्कृति का अपमान करने वालों को कभी ‘धर्मनिरपेक्ष’ कहा जाता था: योगी आदित्यनाथ

झांसी, 9 अक्टूबर — उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बृहस्पतिवार को धर्मनिरपेक्षता की पुरानी व्याख्या पर सवाल उठाते हुए कहा कि आजादी के बाद भारत में कुछ लोगों ने ‘धर्मनिरपेक्षता’ के अर्थ को विकृत कर दिया और जो लोग भारतीय परंपराओं और संस्कृति का अपमान करते थे, उन्हें ही सच्चा धर्मनिरपेक्ष माना जाने लगा।

वे झांसी में आयोजित अखिल भारतीय विद्या भारती शिक्षण संस्थान समूह की 36वीं क्षेत्रीय खेलकूद प्रतियोगिता के समापन समारोह को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा, “आजादी के बाद धर्मनिरपेक्ष दिखने की होड़ सी लग गई। जो लोग भारत की परंपराओं, संस्कृति और मूल्यों का मजाक उड़ाते थे, उन्हें ही सबसे बड़ा धर्मनिरपेक्ष मान लिया गया।”

मुख्यमंत्री ने इस मानसिकता को देश में अलगाववाद और उग्रवाद के लिए जिम्मेदार ठहराया और कहा कि स्वतंत्रता के तुरंत बाद ऐसे विचारों का महिमामंडन शुरू हो गया था।

उन्होंने ‘विद्या भारती’ संस्थान की प्रशंसा करते हुए कहा कि इसने समय रहते इन खतरों को पहचाना और बिना किसी सरकारी मदद के भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित शिक्षा प्रणाली का निर्माण किया। योगी ने कहा, “आज विद्या भारती 25 हजार से अधिक स्कूलों और शिक्षा केंद्रों के माध्यम से राष्ट्रभक्ति और सांस्कृतिक गौरव का भाव जाग्रत कर रही है।”

तुलसीदास को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा, “जिसमें आस्था है, वही ज्ञान प्राप्त करता है। जिनमें भारत और इसकी संस्कृति के प्रति सम्मान नहीं, उनसे देश के निर्माण की आशा नहीं की जा सकती।”

योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर में 1952 में स्थापित पहले सरस्वती शिशु मंदिर को इस आंदोलन की शुरुआत बताया और कहा कि यह शिक्षा के माध्यम से राष्ट्रवाद को मजबूत करने का एक बड़ा उदाहरण है। उन्होंने बुंदेलखंड की ऐतिहासिक विरासत का भी उल्लेख करते हुए झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और ओलंपियन मेजर ध्यानचंद को नमन किया।

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