नई दिल्ली, 20अक्टूबर — देश में विदेशी कंपनियों द्वारा भारतीय बैंकों के अधिग्रहण को लेकर कांग्रेस नेता जयराम रमेश की आलोचना पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने पलटवार किया है। भाजपा ने कांग्रेस को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि वह पार्टी जो स्वतंत्र भारत के “सबसे गंभीर बैंकिंग संकट” की जिम्मेदार रही है, उसे विवेक और नीतियों पर उपदेश देने का कोई अधिकार नहीं है।
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने हाल ही में ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट कर भारतीय बैंकों में विदेशी निवेश और अधिग्रहण पर चिंता जताई थी। उन्होंने कहा था कि लक्ष्मी विलास बैंक, कैथोलिक सीरियन बैंक, येस बैंक और अब संभावित रूप से आरबीएल बैंक का विदेशी कंपनियों द्वारा अधिग्रहण भारतीय बैंकिंग प्रणाली के लिए खतरे की घंटी है। उन्होंने इसे “अविवेकपूर्ण” नीति बताया और आगाह किया कि यह राष्ट्रीय हितों को प्रभावित कर सकता है।
रमेश की इस टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा, “जिस पार्टी ने भारत की बैंकिंग व्यवस्था को भ्रष्टाचार, घोटालों और राजनीतिक दखल से खोखला कर दिया, वह आज नैतिकता का पाठ पढ़ाने की स्थिति में नहीं है।” उन्होंने आरोप लगाया कि संप्रग (UPA) सरकार के दौरान बैंकों को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया, जिससे एनपीए (खराब ऋण) में भारी वृद्धि हुई।
मालवीय ने भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन का हवाला देते हुए कहा कि उन्होंने भी माना था कि सबसे अधिक खराब ऋण संप्रग काल में दिए गए।
भाजपा नेता ने दावा किया कि 2014 में मोदी सरकार के आने के बाद से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में बड़ा बदलाव आया है। उन्होंने कहा, “जहां पहले एनपीए 2.15 लाख करोड़ रुपये (3.9%) था, वह अब घटकर 0.73 लाख करोड़ रुपये (0.76%) रह गया है। प्रावधान कवरेज 46% से बढ़कर 93% हो गई है और पूंजी पर्याप्तता अनुपात 11.45% से बढ़कर 15.55% हो गया है।”
मालवीय ने इसे ‘गंभीर संरचनात्मक सुधारों’ और ‘आरबीआई की सख्त निगरानी’ का परिणाम बताया। उन्होंने जोर दिया कि विदेशी निवेशकों का विश्वास भारत की बैंकिंग प्रणाली में अब कहीं अधिक है, जो कांग्रेस के शासनकाल में नहीं था।
भाजपा ने कांग्रेस की आलोचना को “खोखली बयानबाजी” करार दिया और कहा कि वर्तमान सरकार वित्तीय क्षेत्र को मजबूती देने में सफल रही है। वहीं, कांग्रेस विदेशी अधिग्रहण को लेकर बढ़ती चिंताओं पर केंद्र सरकार से पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग कर रही है।
