नयी दिल्ली, 3 जनवरी । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शनिवार को कहा कि भगवान बुद्ध से जुड़े पवित्र अवशेष केवल ऐतिहासिक वस्तुएं नहीं हैं, बल्कि भारत की वंदनीय विरासत और सभ्यता का अटूट हिस्सा हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत न केवल बुद्ध के पवित्र अवशेषों का संरक्षक है, बल्कि उनकी परंपरा का जीवंत वाहक भी है।
प्रधानमंत्री दक्षिण दिल्ली स्थित किला राय पिथोरा सांस्कृतिक परिसर में आयोजित ‘लाइट एंड लोटस: रेलिक्स ऑफ द अवेकन्ड वन्स’ प्रदर्शनी के उद्घाटन अवसर पर संबोधित कर रहे थे। इस दौरान बौद्ध विद्वान, राजनयिक और विभिन्न देशों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।
मोदी ने कहा कि पवित्र पिपरहवा अवशेष वियतनाम, थाईलैंड और रूस सहित कई देशों की यात्रा कर चुके हैं, जहां बड़ी संख्या में बौद्ध आबादी निवास करती है। इन देशों में इन अवशेषों के दर्शन से आस्था और भक्ति की लहर देखने को मिली और लाखों लोगों ने श्रद्धांजलि अर्पित की।
प्रधानमंत्री ने कहा, “भगवान बुद्ध की यह साझा विरासत इस बात का प्रमाण है कि भारत केवल राजनीति, कूटनीति और अर्थव्यवस्था के माध्यम से ही नहीं, बल्कि आस्था, भावनाओं और आध्यात्मिकता के गहरे बंधनों के जरिए भी विश्व से जुड़ा हुआ है।”
उन्होंने बताया कि सरकार और गोदरेज समूह के संयुक्त प्रयासों से 125 वर्षों से अधिक समय बाद ये पवित्र अवशेष भारत वापस लाए जा सके। मोदी ने यह भी स्मरण कराया कि पिछले वर्ष मई में हांगकांग में इन अवशेषों की प्रस्तावित नीलामी को सरकार और गोदरेज समूह के हस्तक्षेप से रोका गया।
प्रधानमंत्री ने अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए कहा कि गुजरात का वडनगर, जहां उनका जन्म हुआ, बौद्ध अध्ययन का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है, जबकि वाराणसी के समीप स्थित सारनाथ वह स्थान है जहां भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था। उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री बनने से पहले वे एक तीर्थयात्री के रूप में और बाद में प्रधानमंत्री के रूप में दुनिया भर के बौद्ध तीर्थ स्थलों की यात्रा कर चुके हैं।
मोदी ने नेपाल के लुम्बिनी, जापान के तो-जी मंदिर और किंकाकु-जी, चीन के शीआन स्थित जायंट वाइल्ड गूज पैगोडा, मंगोलिया के गांडन मठ और श्रीलंका के अनुराधापुरा स्थित जया श्री महाबोधि की अपनी यात्राओं का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इन स्थलों की यात्रा ने उन्हें सम्राट अशोक, भिक्षु महिंदा और संघमित्रा द्वारा स्थापित बौद्ध परंपरा से गहराई से जोड़ा।
प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्होंने विश्व भर के बौद्ध तीर्थ स्थलों तक बोधिवृक्ष के पौधे पहुंचाने का विशेष प्रयास किया है। उन्होंने हिरोशिमा के उदाहरण का उल्लेख करते हुए कहा कि परमाणु बम से तबाह हुए शहर के वनस्पति उद्यान में बोधि वृक्ष का खड़ा होना मानवता के लिए शांति और करुणा का गहरा संदेश देता है।
मोदी ने कहा कि सरकार बौद्ध विरासत को अगली पीढ़ियों तक स्वाभाविक रूप से पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है। इसी उद्देश्य से वैश्विक बौद्ध शिखर सम्मेलन तथा वैशाख और आषाढ़ पूर्णिमा जैसे अंतरराष्ट्रीय आयोजनों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि पाली भाषा को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया गया है, जिससे बुद्ध के उपदेशों को उनके मूल स्वरूप में समझना और बौद्ध परंपरा से जुड़े शोध को सुदृढ़ करना संभव होगा।
उल्लेखनीय है कि पिपरहवा अवशेष प्रारंभिक बौद्ध धर्म के पुरातात्विक अध्ययन में केंद्रीय स्थान रखते हैं। आधिकारिक बयान के अनुसार, ये अवशेष भगवान बुद्ध से सीधे जुड़े सबसे प्राचीन और ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण माने जाते हैं। पुरातत्वीय साक्ष्यों के अनुसार, पिपरहवा स्थल प्राचीन कपिलवस्तु से जुड़ा था, जिसे भगवान बुद्ध के संन्यास से पूर्व के जीवन से संबंधित स्थान के रूप में पहचाना जाता है।
