नयी दिल्ली। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रीजीजू ने मंगलवार को स्पष्ट किया कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया फिलहाल जारी है और केंद्र सरकार लोकसभा अध्यक्ष द्वारा गठित जांच समिति की रिपोर्ट का इंतजार कर रही है।
रीजीजू ने कहा कि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने न्यायमूर्ति वर्मा को हटाने के लिए प्रस्तुत बहुदलीय नोटिस स्वीकार करने के बाद 12 अगस्त 2025 को तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया था। यह समिति न्यायमूर्ति वर्मा पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कर रही है।
न्यायमूर्ति वर्मा को 14 मार्च 2025 को दिल्ली उच्च न्यायालय से इलाहाबाद उच्च न्यायालय वापस भेजा गया था। यह कदम उनके आधिकारिक आवास पर कथित तौर पर नोटों के जले हुए बंडल मिलने के बाद उठाया गया था, जिससे न्यायिक हलकों में गंभीर सवाल खड़े हुए।
यह पूछे जाने पर कि क्या आगामी बजट सत्र के दौरान इस विषय पर संसद में चर्चा की जाएगी, रीजीजू ने इस पर टिप्पणी करने से इनकार किया। उन्होंने कहा,
“प्रक्रिया के अनुसार, सदन की सहमति से अध्यक्ष द्वारा गठित समिति को मामला सौंपा गया है और जांच जारी है।”
जांच समिति में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, मद्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश मनिंद्र मोहन श्रीवास्तव, और कर्नाटक उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता बी. वी. आचार्य शामिल हैं।
न्यायिक नियुक्ति और बर्खास्तगी की प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, यदि न्यायमूर्ति वर्मा संसद के किसी भी सदन में अपना पक्ष रखते हुए पद छोड़ने की घोषणा करते हैं, तो उनके मौखिक बयान को इस्तीफा माना जा सकता है। ऐसी स्थिति में वे पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों के हकदार होंगे।
हालांकि, यदि संसद द्वारा उन्हें पद से हटाया जाता है, तो उन्हें इन सभी लाभों से वंचित होना पड़ेगा।
