नाबालिग की अवैध गिरफ्तारी पर बिहार सरकार को 5 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश

पटना, 12 जनवरी । पटना उच्च न्यायालय ने चोरी के एक मामले में नाबालिग लड़के की “अवैध गिरफ्तारी” और दो महीने से अधिक समय तक जेल में रखे जाने को गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन करार देते हुए बिहार सरकार को पीड़ित को पांच लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया है। अदालत ने मामले के जांच अधिकारी (आईओ) और मजिस्ट्रेट की भूमिका पर भी कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में नाबालिग को वयस्क बताकर गिरफ्तार किया गया और उसे “यांत्रिक तरीके से” जेल भेज दिया गया।

न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद और न्यायमूर्ति रितेश कुमार की खंडपीठ ने राज्य सरकार को यह भी आदेश दिया कि याचिकाकर्ता के परिवार द्वारा मुकदमे की पैरवी में हुए खर्च की भरपाई के लिए 15,000 रुपये अतिरिक्त अदा किए जाएं। अदालत ने स्पष्ट किया कि पांच लाख रुपये की मुआवजा राशि एक माह के भीतर याचिकाकर्ता को दी जानी चाहिए।

मामला मधेपुरा जिले के पुरैनी थाना क्षेत्र का है, जहां 11 जुलाई को भूमि विवाद को लेकर पंचायत बैठक के दौरान मारपीट और चांदी की चेन व अन्य आभूषणों की लूट के आरोप में 16 वर्षीय लड़के सहित 14 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी। उच्च न्यायालय के अनुसार, 14 में से 10 आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त सामग्री नहीं मिलने पर उनके विरुद्ध आरोपपत्र दाखिल नहीं किया गया था। इसके बावजूद कोसी रेंज के पुलिस उप महानिरीक्षक (डीआईजी) के निर्देश पर जांच अधिकारी ने 10 अक्टूबर को इन 10 लोगों को गिरफ्तार कर लिया।

अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता को 25 अक्टूबर को 19 वर्ष का बताकर गिरफ्तार किया गया और मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया। बाद में 24 नवंबर को सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के परिजनों ने जन्म प्रमाण पत्र के माध्यम से अदालत को बताया कि वह नाबालिग है।

खंडपीठ ने अपने नौ जनवरी के आदेश में कहा कि इस पूरे घटनाक्रम से याचिकाकर्ता को ढाई महीने तक शारीरिक और मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ी, जो उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का स्पष्ट उल्लंघन है। अदालत ने कहा कि कोसी रेंज के डीआईजी द्वारा आरोपों को सही मानकर जांच करने का निर्देश, आपराधिक न्यायशास्त्र के उस मूल सिद्धांत के खिलाफ है, जिसके तहत प्रत्येक व्यक्ति को दोष सिद्ध होने तक निर्दोष माना जाता है।

अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि किशोर न्याय (बालकों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के प्रावधानों का पूर्ण उल्लंघन करते हुए नाबालिग को जेल में रखा गया। खंडपीठ ने कहा कि यह अवैध गिरफ्तारी का स्पष्ट मामला है और ऐसी स्थिति में संवैधानिक न्यायालय “मूक दर्शक” नहीं बन सकता।

उच्च न्यायालय ने इस फैसले के जरिए न केवल पीड़ित नाबालिग को राहत दी, बल्कि पुलिस और निचली अदालतों को भी कानून के प्रति अधिक सतर्कता और संवेदनशीलता बरतने का स्पष्ट संदेश दिया है।

Related Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *