नयी दिल्ली, 10 जनवरी । निर्दलीय सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने शनिवार को सवाल उठाया कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) विपक्षी नेताओं के खिलाफ अपनी कार्रवाई केवल चुनाव के समय ही क्यों तेज कर देता है। उन्होंने इस प्रवृत्ति पर हैरानी जताते हुए उच्चतम न्यायालय से जांच एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र से जुड़ी लंबित पुनर्विचार याचिकाओं पर शीघ्र सुनवाई का अनुरोध किया।
यहां आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में सिब्बल ने आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल में ईडी की हालिया कार्रवाई का एकमात्र उद्देश्य विपक्षी नेताओं को परेशान करना प्रतीत होता है। उन्होंने झारखंड में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के खिलाफ कार्रवाई और बिहार में विधानसभा चुनाव के दौरान लालू प्रसाद यादव तथा तेजस्वी यादव के मामलों का हवाला देते हुए कहा कि हर बार चुनाव के आसपास ही जांच एजेंसियां सक्रिय हो जाती हैं।
सिब्बल ने यह भी सवाल किया कि पश्चिम बंगाल में राजनीतिक परामर्श फर्म आई-पैक पर छापेमारी के बाद ईडी आखिर किस बात की जांच कर रही है। उन्होंने कहा कि जांच एजेंसी मनमाने ढंग से सभी दस्तावेज अपने साथ नहीं ले जा सकती। गौरतलब है कि ईडी ने बृहस्पतिवार को कोयला तस्करी से जुड़े एक मामले में कोलकाता में आई-पैक के कार्यालय और उसके प्रमुख के आवास पर छापेमारी की थी, जिसके दौरान एजेंसी को कथित तौर पर बाधाओं का सामना करना पड़ा।
ईडी का दावा है कि छापेमारी के दौरान पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मौके पर पहुंचीं और जांच से जुड़े “महत्वपूर्ण” सबूत अपने साथ ले गईं। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए सिब्बल ने कहा कि ईडी को पहले यह स्पष्ट करना चाहिए कि वह किस मामले में और किन दस्तावेजों की जांच कर रही थी। उन्होंने कहा कि यदि कोयला घोटाले से जुड़े दस्तावेजों की आवश्यकता थी, तो एजेंसी को कंप्यूटर और डेटा तक पहुंच के लिए विधिवत अनुमति मांगनी चाहिए थी।
पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के कार्यकाल के दौरान कभी भी झूठी जानकारी के आधार पर किसी राजनीतिक दल या नेता के खिलाफ मुकदमे नहीं चलाए गए। उन्होंने दावा किया कि 2004 से 2014 के बीच ईडी को इतनी खुली छूट नहीं दी गई थी जितनी आज है।
सिब्बल ने कहा, “जब ईडी का गठन हुआ था, तब यह नहीं सोचा गया था कि वह एक सर्वव्यापी अभियोजन एजेंसी बन जाएगी, जो देश में कहीं भी, कभी भी जा सकेगी। यह संघीय ढांचे पर भी हमला कर सकती है—चाहे वह विपक्षी नेताओं को परेशान करना हो या उनकी सरकारों को गिराना, सही हो या गलत।”
पश्चिम बंगाल की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि वह देश की एकता और अखंडता को किसी भी तरह से कमजोर होते नहीं देखना चाहते। जब उनसे पूछा गया कि क्या मौजूदा हालात में राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है, तो सिब्बल ने कहा कि यदि कोई बिना आधार के मनमाना फैसला लिया जाता है, तो उसके राजनीतिक नतीजे भी होंगे।
राज्यसभा सदस्य सिब्बल ने दोहराया कि जहां भी कोई प्राथमिकी दर्ज होती है, वहां ईडी पहुंच जाती है, मानो उसे हर जगह जांच करने का अधिकार हो। उन्होंने कहा, “यह दिलचस्प है कि ईडी केवल उन्हीं राज्यों में सक्रिय होती है, जहां चुनाव होने वाले होते हैं। झारखंड और बिहार इसके उदाहरण हैं, और अब पश्चिम बंगाल में भी चुनाव होने हैं, इसलिए ईडी वहां पहुंच गई है।”
उन्होंने आरोप लगाया कि जांच एजेंसियों का रवैया और इरादा स्पष्ट है—विपक्षी दलों, विशेषकर तृणमूल कांग्रेस और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को परेशान करना, क्योंकि भारतीय जनता पार्टी राज्य में चुनावी रूप से सफल नहीं हो पा रही है।
सिब्बल ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, “ईडी सर्वव्यापी है, ईश्वर की तरह। यह इस सरकार का भगवान बन चुकी है और कुछ भी कर सकती है। सीबीआई की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है।”
