एसआईआर के बीच सुप्रीम कोर्ट का बड़ा निर्देश, ‘तार्किक विसंगति’ सूची सार्वजनिक करने का आदेश

नयी दिल्ली, 29 जनवरी । देश के विभिन्न राज्यों में चल रहे मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बीच उच्चतम न्यायालय ने निर्वाचन आयोग को अहम निर्देश देते हुए कहा है कि ‘तार्किक विसंगति’ की सूची में शामिल मतदाताओं के नाम ग्राम पंचायत भवनों, ब्लॉक कार्यालयों और शहरी क्षेत्रों के वार्ड कार्यालयों में सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किए जाएं।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने यह आदेश तमिलनाडु में एसआईआर के दौरान कथित मनमानी और प्रक्रियात्मक अनियमितताओं से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई के दौरान दिया। द्रमुक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल सहित अन्य वकीलों ने दलील दी कि ‘तार्किक विसंगति’ के आधार पर बड़ी संख्या में मतदाताओं को सूची से बाहर किए जाने का खतरा है।

पीठ ने स्पष्ट किया कि ‘तार्किक विसंगति’ श्रेणी में पिता के नाम का मिलान न होना, माता-पिता या दादा-दादी की उम्र में असामान्य अंतर, माता-पिता की उम्र में 50 वर्ष से अधिक का अंतर, दादा-दादी की उम्र में 40 वर्ष से कम का अंतर तथा छह से अधिक संतान जैसे कारण शामिल किए गए हैं।

न्यायालय ने निर्देश दिया कि ऐसे सभी मतदाताओं को अपने दावे और आपत्तियां दर्ज कराने के लिए पर्याप्त समय और अवसर दिया जाए। निर्वाचन आयोग को कहा गया है कि सूची प्रदर्शित होने की तारीख से 10 दिनों का अतिरिक्त समय उन लोगों को दिया जाए, जिन्होंने अभी तक अपने दस्तावेज या आपत्तियां दाखिल नहीं की हैं।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रभावित व्यक्ति स्वयं या अपने अधिकृत प्रतिनिधि, जिनमें बूथ स्तरीय एजेंट (बीएलए) भी शामिल हो सकते हैं, के माध्यम से दस्तावेज जमा कर सकते हैं। पंचायत भवनों या तालुका कार्यालयों में दावे और आपत्तियां स्वीकार की जाएंगी।

इसके साथ ही पीठ ने राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि वे पंचायत भवनों में दस्तावेजों और आपत्तियों को संभालने तथा सुनवाई के लिए पर्याप्त जनशक्ति उपलब्ध कराएं। जिलाधिकारियों, पुलिस महानिदेशकों और पुलिस अधीक्षकों को यह सुनिश्चित करने को कहा गया है कि इस प्रक्रिया के दौरान किसी भी तरह की कानून-व्यवस्था की समस्या उत्पन्न न हो।

उल्लेखनीय है कि बिहार में एसआईआर प्रक्रिया पूरी होने के बाद इसका दूसरा चरण छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, केरल, मध्यप्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में चल रहा है। न्यायालय ने इससे पहले पश्चिम बंगाल से जुड़ी याचिकाओं पर भी इसी तरह के निर्देश जारी किए थे।

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