नयी दिल्ली, 17 जनवरी : राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह ने शनिवार को कहा कि जो समाज अपने इतिहास को भूल जाता है, वह केवल अपना भविष्य ही नहीं खोता, बल्कि अपनी नैतिक दिशा से भी भटक जाता है। उन्होंने यह बात भारत मंडपम में चल रहे विश्व पुस्तक मेले के दौरान आयोजित एक संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कही।
यह संगोष्ठी ‘श्री वीर विठ्ठल भाई की गौरव गाथा: एक शताब्दी यात्रा’ पुस्तक के विमोचन के अवसर पर आयोजित की गई थी। कार्यक्रम का आयोजन दिल्ली विधानसभा द्वारा किया गया।
अपने संबोधन में उपसभापति हरिवंश ने कहा, “इतिहास केवल अतीत का अभिलेख नहीं है, बल्कि वह आधारशिला है, जिस पर लोकतांत्रिक संस्थाएं, जनचेतना और राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण होता है। जो समाज अपने इतिहास को भुला देता है, वह नैतिक रूप से भी दिशाहीन हो जाता है।”
उन्होंने दिल्ली विधानसभा सचिवालय की सराहना करते हुए कहा कि गहन शोध और दस्तावेजीकरण पर आधारित इस प्रकाशन के माध्यम से भारत के स्वतंत्रता संग्राम के एक लगभग विस्मृत अध्याय को पुनर्जीवित किया गया है। उपसभापति ने रॉलेट अधिनियम के दौर का उल्लेख करते हुए कहा कि वीर विट्ठलभाई पटेल ने उस समय विधान परिषद में 220 से अधिक संशोधन प्रस्तुत किए थे और वह परिषद के पहले भारतीय अध्यक्ष बने थे।
इस अवसर पर दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि वर्ष 1912 से 1933 तक का कालखंड भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का सबसे निर्णायक दौर रहा, जिसका समापन 22 अक्टूबर 1933 को वीर विट्ठलभाई पटेल के निधन के साथ हुआ।
गुप्ता ने कहा, “विट्ठलभाई पटेल एक क्रांतिकारी, स्वतंत्रता सेनानी और दूरदर्शी विधायी नेता थे, जिन्होंने भारतीय संसदीय लोकतंत्र की संस्थागत नींव रखी।” उन्होंने यह भी कहा कि विट्ठलभाई पटेल ने सरदार वल्लभभाई पटेल और सुभाष चंद्र बोस जैसे राष्ट्रीय नेताओं का मार्गदर्शन किया और आने वाले वर्षों में उन्हें भारत की स्वतंत्रता के प्रमुख सूत्रधारों में से एक के रूप में व्यापक पहचान मिलेगी।
संगोष्ठी में दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष के अलावा शिक्षाविद, इतिहासकार, विद्यार्थी और विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े अनेक लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम में स्वतंत्रता संग्राम के योगदानकर्ताओं की विरासत को संरक्षित करने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।
