इजराइल दौरे के बीच कांग्रेस का हमला, विदेश नीति को लेकर सरकार पर उठाए सवाल

नयी दिल्ली, 25 फरवरी (RNN। कांग्रेस ने बुधवार को भारत-इजराइल संबंधों और केंद्र सरकार की विदेश नीति को लेकर तीखा राजनीतिक हमला किया। पार्टी ने आरोप लगाया कि वर्ष 2014 के बाद भारत की पारंपरिक विदेश नीति की दिशा बदल गई है और सरकार दो-राष्ट्र सिद्धांत से दूर जाती दिखाई दे रही है।

कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा ने संवाददाताओं से बातचीत में कहा कि भारत ऐतिहासिक रूप से इजराइल और फलस्तीन के मुद्दे पर संतुलित रुख अपनाता रहा है। उनके अनुसार, दशकों से भारत ने दो-राष्ट्र सिद्धांत का समर्थन किया, लेकिन वर्तमान सरकार की नीतियां इस स्थापित परंपरा से भिन्न प्रतीत होती हैं।

खेड़ा ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इजराइल दौरे के संदर्भ में सरकार की विदेश नीति की आलोचना करते हुए कई गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ प्रभावशाली समूहों के दबाव में भारत की नीति की “दशा और दिशा” बदली गई है। कांग्रेस नेता ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ व्यक्तियों और घटनाओं का प्रभाव सरकार की विदेश नीति पर असामान्य रूप से अधिक दिखाई देता है।

अपने बयान में उन्होंने दिवंगत अमेरिकी कारोबारी जेफ्री एप्सटीन का उल्लेख करते हुए कहा कि उससे जुड़े विवादों और कथित संपर्कों को लेकर सरकार को स्पष्ट जवाब देना चाहिए। उन्होंने यह भी दावा किया कि कुछ पूर्व संपर्कों और कथित संवादों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, ताकि तथ्यों की स्थिति स्पष्ट हो सके।

खेड़ा ने केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और उद्योगपति अनिल अंबानी का नाम लेते हुए कथित ईमेल आदान-प्रदान का उल्लेख किया और कहा कि सरकार को इस विषय पर पारदर्शिता दिखानी चाहिए। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है और सरकार की ओर से इन दावों पर आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

कांग्रेस नेता ने कहा कि भारत की विदेश नीति ऐतिहासिक रूप से स्वतंत्र और संतुलित रही है तथा उसे राष्ट्रीय हितों के अनुरूप ही संचालित किया जाना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि देश में महत्वपूर्ण मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए अन्य विषयों को प्रमुखता दी जा रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इजराइल-फलस्तीन मुद्दा लंबे समय से भारत की विदेश नीति में संतुलन का विषय रहा है। भारत ने एक ओर इजराइल के साथ रक्षा, कृषि और प्रौद्योगिकी सहयोग को मजबूत किया है, वहीं दूसरी ओर फलस्तीन के साथ पारंपरिक समर्थन और राजनयिक संबंध बनाए रखे हैं। ऐसे में विपक्ष द्वारा उठाए गए सवालों ने इस बहस को फिर से राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया है।

उधर, केंद्र सरकार ने बार-बार कहा है कि भारत की विदेश नीति राष्ट्रीय हितों और रणनीतिक साझेदारियों के आधार पर तय होती है तथा वैश्विक मंचों पर भारत संतुलित और स्वतंत्र रुख अपनाता है। सरकार के समर्थकों का तर्क है कि इजराइल के साथ बढ़ता सहयोग तकनीकी, रक्षा और आर्थिक क्षेत्रों में भारत के लिए लाभकारी रहा है।

फिलहाल कांग्रेस के आरोपों और सरकार की चुप्पी के बीच यह मुद्दा राजनीतिक बहस का विषय बन गया है। आने वाले दिनों में इस पर सरकार की औपचारिक प्रतिक्रिया और संसद या सार्वजनिक मंचों पर संभावित चर्चा पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

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