लखनऊ, 30 अप्रैल 2026 (यूएनएस)। उत्तर प्रदेश विधानसभा के एक दिवसीय विशेष सत्र में गुरुवार को लाए गए प्रस्ताव को लेकर सदन में शुरुआती दौर से ही राजनीतिक तनातनी देखने को मिली। नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय ने प्रस्ताव की वैधता पर सवाल उठाते हुए आपत्ति दर्ज कराई, जबकि विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना ने स्पष्ट किया कि इस विषय पर चर्चा पूरी तरह संभव है।
नेता प्रतिपक्ष ने उठाया नियमावली का मुद्दा
सदन की कार्यवाही शुरू होते ही संसदीय कार्य मंत्री सुरेश कुमार खन्ना ने कार्यमंत्रणा समिति के प्रस्ताव की जानकारी दी। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय ने कहा कि विधानसभा की नियमावली के अनुसार ऐसे विषयों पर चर्चा या मतदान नहीं कराया जाना चाहिए, जो राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में नहीं आते।
उन्होंने तर्क दिया कि महिला आरक्षण विधेयक संसद के अधिकार का विषय है, न कि राज्य सरकार का। ऐसे में इस पर विधानसभा में चर्चा करना नियमों के अनुरूप नहीं है।
हालांकि, पांडेय ने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी नारी सशक्तीकरण और महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं है, बल्कि उसका समर्थन करती है। उन्होंने प्रस्ताव में “नारी शक्ति वंदन अधिनियम में बाधा” जैसी भाषा को निंदात्मक बताते हुए सवाल उठाया कि आखिर यह बाधा कहां उत्पन्न की जा रही है।
सरकार ने किया जवाब
संसदीय कार्य मंत्री सुरेश कुमार खन्ना ने नेता प्रतिपक्ष की आपत्ति पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है और इस पर आपत्ति उठाना दुर्भाग्यपूर्ण है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार का प्रस्ताव महिला आरक्षण पर नहीं, बल्कि नारी सशक्तीकरण पर केंद्रित है। आरक्षण का विषय केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है, लेकिन महिलाओं के सशक्तीकरण पर चर्चा करना पूरी तरह से राज्य के दायरे में है।
खन्ना ने कहा कि यह प्रस्ताव विधानसभा की नियमावली के नियम-103 के तहत लाया गया है, जिसके अंतर्गत जनहित से जुड़े विषयों पर चर्चा की जा सकती है।
अध्यक्ष का निर्णय: चर्चा होगी
विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद व्यवस्था देते हुए कहा कि नारी सशक्तीकरण जैसे मुद्दे पर चर्चा पर कोई रोक नहीं लगाई जा सकती।
उन्होंने कहा कि नियम-103 के तहत अध्यक्ष की अनुमति से किसी भी जनहित के विषय पर प्रस्ताव लाया जा सकता है और उस पर चर्चा की जा सकती है।
महाना ने यह भी स्पष्ट किया कि संसदीय लोकतंत्र में संविधान निर्माताओं ने किसी विशेष विषय पर चर्चा के लिए कठोर सीमाएं निर्धारित नहीं की हैं। सदन की सहमति और अध्यक्ष की मंजूरी से समाज से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर बहस संभव है।
अध्यक्ष का अंतिम अधिकार
अध्यक्ष ने कहा कि विधानसभा अपनी कार्यप्रणाली तय करने में सक्षम और सर्वोपरि है। नियम-103 के अंतर्गत किसी प्रस्ताव की ग्राह्यता और उस पर चर्चा कराने का अंतिम निर्णय अध्यक्ष का ही होता है। विशेष सत्र की शुरुआत ही राजनीतिक बहस और नियमों की व्याख्या को लेकर तीखी नोकझोंक के साथ हुई। हालांकि, अध्यक्ष के फैसले के बाद यह साफ हो गया कि नारी सशक्तीकरण के मुद्दे पर सदन में विस्तृत चर्चा होगी, जिससे आगे भी सत्ता और विपक्ष के बीच टकराव जारी रहने के संकेत हैं।
