भारत का भविष्य निर्धारित करेंगी पांच प्रवृत्तियां

– पी. चिदम्बरम

मैं कई वर्षों से भारत में सामाजिक और राजनीतिक प्रवृत्तियों का अवलोकन कर रहा हूं। जो एक गहरी बहती हुई धारा प्रतीत होती है। हो सकता है कि वह वैसी न हो, और केवल एक गुजरता हुआ बादल हो। एक गुजरता हुआ बादल एक स्वागत योग्य बौछार तो ला सकता है, लेकिन वह जलवायु की कोई स्थायी विशेषता नहीं होता।

1947 एक ऐतिहासिक मोड़ का वर्ष था। स्वतंत्रता के बाद से, कई दृश्य प्रभाव और प्रवृत्तियां देखी गईं लेकिन वे अल्पकालिक थीं, और कई ऐसी शुरुआती प्रवृत्तियां जिन पर अधिकांश लोगों का ध्यान नहीं गया, वे स्थायी बन गई हैं। उदाहरण के लिए, गांधी जी की लगभग दैवीय स्थिति और सैंकड़ों समर्पित गांधीवादियों के बावजूद, गांधीवादी जीवन शैली, अहिंसा, सत्याग्रह, चरखा और सविनय अवज्ञा गांधी जी के बाद एक-दो दशकों से अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकी। दूसरी ओर, बहुत कम लोगों ने भारत के तीव्र शहरीकरण की उम्मीद की थी, उससे भी कम लोगों ने जलवायु परिवर्तन पर ध्यान दिया, और उससे भी कम लोगों ने मनुष्यों और विज्ञान व प्रौद्योगिकी के बीच के जटिल संबंध को समझा।

कहावत है, ‘भविष्यवाणी करना बहुत कठिन है, विशेषकर तब जब यह भविष्य के बारे में हो’ (नोबेल पुरस्कार विजेता नील्स बोहर और महान बेसबॉल खिलाड़ी योगी बेरा)। फिर भी, मैं इस वर्जित क्षेत्र में कदम रखने का साहस करूंगा। मैंने पांच ऐसी प्रवृत्तियों को देखा है जो ताकत और गति पकड़ सकती हैं। भले ही मैं उनमें से कुछ को नापसंद करता हूं और उनसे डरता हूं, ये प्रवृत्तियां अजेय लगती हैं।

लोकतंत्र जनता की सरकार है। लोग स्वतंत्र पैदा होते हैं और उन्हें कई तरह की स्वतंत्रताओं के अधिकार होते हैं। एक लोकतांत्रिक सरकार वह सरकार होती है जो लोगों के अधिकारों का सम्मान करती है और उन्हें बनाए रखती है, और जिसने स्वतंत्र संस्थानों की स्थापना की है जो अधिकारों की रक्षा और उन्हें लागू करेंगे। फ्रीडम हाऊस, वी-डेम इंस्टीच्यूट और रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (सभी अनुसंधान संस्थान) विभिन्न संकेतकों के तहत स्कोर के आधार पर देशों को ‘स्वतंत्र’ या नहीं के रूप में वर्गीकृत करते हैं। अधिक से अधिक देशों का स्कोर घट रहा है। भारत का स्कोर 2005 में 77 था और घटकर 63.67 हो गया है। भारत के केवल एक ‘चुनावी लोकतंत्र’ बने रहने की संभावना है और चुनाव कम स्वतंत्र और निष्पक्ष होंगे। भारतीय लोग कल्याणकारी उपायों, बेहतर बुनियादी ढांचे और एक दमनकारी सामाजिक संरचना को कोई चुनौती न मिलने के बदले में घटते स्कोर से बेअसर दिखते हैं। चीन का स्कोर कई वर्षों से 9/100 पर अटका हुआ है, लेकिन सभी रिपोर्टों के अनुसार, चीनी लोग खुश हैं। भारत उस रास्ते पर चल सकता है।

अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों पर दुविधाधिकार या अल्पाधिकार का दबदबा है-हवाई यात्रा, दूरसंचार, सीमेंट, स्टील, बिजली, फार्मास्यूटिकल्स, पैट्रोलियम, रक्षा उत्पादन, खनन और खुदरा। और अधिक क्षेत्र इसी रास्ते पर जा सकते हैं। छोटे व्यवसाय और एम.एस.एम.ई. लगभग विलुप्त हो जाएंगे। गैर-सरकारी संगठनों (एन.जी.ओ.) का दम घोंटा जाएगा। आर्थिक शक्ति का वितरण तेजी से एकाधिकारवादियों के पक्ष में विषम होता जाएगा। पूंजी और श्रम के बीच का संतुलन पूंजी के पक्ष में झुकता रहेगा। आय का वितरण अमीर और अत्यधिक अमीर लोगों के पक्ष में विषम हो जाएगा। आय की असमानताएं बढ़ेंगी और हम कम समतावादी होंगे।

अधिकांश बड़े शहर कॉस्मोपॉलिटन (शहरीकृत) बन गए हैं और भाषाओं, धर्मों, संस्कृतियों और व्यंजनों का मिश्रण हैं। कई कस्बे भी इसी राह पर चल रहे हैं। शहरीकरण और मास ट्रांजिट (सामूहिक पारगमन) प्रणालियां इस प्रवृत्ति को भारत में और गहराई तक ले जाएंगी। कोई भी किसी जगह से ‘संबद्ध’ नहीं होगा। संयुक्त परिवार की तरह ‘मूल स्थान’ भी विलुप्त हो जाएगा। अधिकांश लोग जो किसी को मिलेंगे, वे अजनबी होंगे। दोस्तों का दायरा छोटा हो जाएगा और रिश्ते उपकरणों के माध्यम से बनेंगे। बातचीत मशीनों द्वारा संचालित होगी। मनुष्यों के बीच के संबंधों को भावनाएं नहीं, बल्कि लेन-देन निर्धारित करेंगे। यौन संबंध जीवित रह सकते हैं क्योंकि सेक्स के प्रसव से इतर भी फायदे हैं।

विज्ञान और बनावटी विज्ञान को अलग करने वाली रेखा गायब हो जाएगी। जैसा कि श्री वासुदेवन मुकुंथ ने लिखा (द हिंदू, दिनांक 23 जून, 2026), शैक्षणिक अधिकारी पौराणिक विज्ञान को विज्ञान के रूप में, पौराणिक कथाओं को इतिहास के रूप में, अनुष्ठान को तकनीक के रूप में और सत्यापन योग्यता के प्रति खुले तिरस्कार को संस्थागत रूप देंगे। अधिक आई.आई.टी. को पौराणिक कहानियों, पुनर्जन्म और वैदिक जीव विज्ञान में ‘शोध’ करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। सांस्कृतिक पुनरुत्थान मंदिरों के पुनर्निर्माण और हिंदू त्योहारों को मनाने के इर्द-गिर्द घूमेगा। कई शहरों में मांस की दुकानों पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है।

ऊपर बताई गई प्रवृत्तियों के परिणाम 144 करोड़ लोगों के लिए भारी होंगे, जो 167 करोड़ पर पहुंचकर स्थिर हो जाएंगे और फिर घटने लगेंगे। भारत आगे बढ़ेगा-चाहे 5 प्रतिशत की दर से या उससे अधिक-सरकार चाहे जो भी हो, क्योंकि भारतीय भोजन उगाएंगे, सामान का उत्पादन करेंगे, और उपभोग या निर्यात करेंगे। अमीर और अत्यधिक अमीर लोगों की संख्या बढ़ेगी, लेकिन पिरामिड के निचले हिस्से पर कई मिलियन लोग जमा होंगे। वे मिलियन लोग कम मांग, कम उपभोग, निम्न जीवन स्तर और कम विकास का अनुभव करेंगे। इसके अलावा, यदि लाखों लोगों को किसी न किसी बहाने भारत की कहानी में भाग लेने से बाहर कर दिया जाता है, तो उनका जीवन और बदतर हो जाएगा।

भारत कम समान, और अधिक विभाजित व क्रोधित होगा। आप इन पांच प्रवृत्तियों पर विवाद कर सकते हैं या इनमें कुछ जोड़ या घटा सकते हैं, लेकिन आप इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि देश की दिशा और देखी जाने वाली प्रवृत्तियां ही दुनिया में भारत का स्थान निर्धारित करेंगी।

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