प्रो. मनोज कुमार झा…..
महिला आरक्षण को विधायिकाओं में महिलाओं के अल्प-प्रतिनिधित्व को दूर करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम बताया जा रहा है। लेकिन उत्सव के बीच एक असहज करने वाली चुप्पी भी मौजूद है और यह चुप्पी इस मूल प्रश्न पर है कि ये महिलाएं कौन होंगी, और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण, कौन नहीं होंगी? भारतीय राज्य ने ऐतिहासिक रूप से असमानता की बहुस्तरीय प्रकृति को स्वीकारा है।
जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान किसी दया या कृपा का परिणाम नहीं था, बल्कि उस गहरी संरचनात्मक वंचना की स्वीकृति था, जिसने सदियों तक इन समुदायों को सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक और राजनीतिक रूप से हाशिए पर रखा। लेकिन जब बात महिलाओं के आरक्षण की आती है, तो एक खतरनाक सरलीकरण सामने आता है, मानो महिलाएं एक समान श्रेणी हों, जिनके अनुभव और अवसर एक जैसे हों। वास्तविकता यह है कि समाज में सत्ता के ढांचे- पितृसत्ता, जाति और वर्ग- अलग-अलग नहीं चलते, बल्कि एक-दूसरे में गुंथे हुए हैं।
एक दलित महिला का जीवन-अनुभव एक सवर्ण महिला से भिन्न होता है। एक आदिवासी महिला के सामने आने वाली चुनौतियां लैंगिक आधार पर ही नहीं समझी जा सकतीं। इन अंतरों को नजरअंदाज करना, विधायी सुविधा के नाम पर सामाजिक यथार्थ को मिटा देना है। यही कारण है कि कोटा के भीतर कोटा की मांग महज तकनीकी सुधार नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व की अवधारणा को सार्थक बनाने का प्रयास है। इसके अभाव में यह लगभग तय है कि आरक्षण का लाभ मुख्यतः उन महिलाओं तक सीमित रह जाएगा, जो पहले ही अपेक्षाकृत सशक्त हैं- सवर्ण, शहरी और राजनीतिक रूप से जुड़ी हुई।
हाशिये के समुदायों की महिलाओं के लिए राजनीति में प्रवेश की बाधाएं- आर्थिक संसाधनों की कमी, सामाजिक नेटवर्क का अभाव, दलगत समर्थन की सीमाएं, गहरे पैठे जातिगत पूर्वग्रह- सिर्फ आरक्षण की घोषणा से समाप्त नहीं होतीं। बल्कि प्रतिस्पर्धा के इस नए परिदृश्य में वे और अधिक तीव्र हो सकती हैं। इस परिदृश्य में एक गंभीर आशंका उभरती है- महिला सशक्तीकरण का नारा कहीं अभिजात्य वर्ग की शक्ति को और सुदृढ़ करने का माध्यम न बन जाए। यह आशंका काल्पनिक नहीं है। स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण के अनुभव इस दिशा में महत्वपूर्ण संकेत देते हैं।
पंचायतों में महिलाओं की भागीदारी निश्चित रूप से बढ़ी, लेकिन अनेक अध्ययनों ने यह भी दिखाया कि इसका लाभ अकसर प्रभावशाली सामाजिक समूहों की महिलाओं तक ही सीमित रहा। वंचित समुदायों की महिलाएं या तो इससे बाहर रहीं या सत्ता के स्थापित ढांचों के भीतर प्रतीकात्मक उपस्थिति तक सीमित हो गईं। प्रतिनिधित्व इस बात का प्रश्न है कि कौन बोल रहा है, किसके अनुभवों को स्थान मिल रहा है और किन मुद्दों को प्राथमिकता दी जा रही है। किसी महिला का निर्वाचित पद पर होना अपने आप में सभी महिलाओं के हितों का प्रतिनिधित्व नहीं करता। प्रतिनिधित्व तभी सम्भव है जब विविध सामाजिक पृष्ठभूमियों की महिलाएं निर्णय-प्रक्रिया का हिस्सा बनें। यही वह बिंदु है जहां कोटा के भीतर कोटा की आवश्यकता स्पष्ट हो जाती है।
अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग की महिलाओं के लिए आनुपातिक आरक्षण सुनिश्चित करना किसी प्रकार का विभाजन नहीं, बल्कि लोकतंत्र को अधिक समावेशी और न्यायसंगत बनाने का प्रयास है। यह इस मूल सत्य की स्वीकृति है कि समानता का अर्थ केवल अवसरों की औपचारिक उपलब्धता नहीं, बल्कि उन बाधाओं को पहचानना और दूर करना भी है, जो विभिन्न समूहों को अलग-अलग तरीकों से प्रभावित करती हैं। इसके विरोध में तर्क दिया जाता है कि इससे व्यवस्था अत्यधिक जटिल हो जाएगी। लेकिन जटिलता को अन्याय का औचित्य नहीं बनाया जा सकता।
भारतीय संविधान ने दिखाया है कि वह सामाजिक वास्तविकताओं की जटिलताओं को समाहित करने में सक्षम है। कोटा के भीतर कोटा केवल सीटों का पुनर्वितरण नहीं करता, बल्कि शक्ति के संतुलन को बदलने का प्रयास करता है। साथ ही, यह महिलाओं की श्रेणी के भीतर भी मौजूद असमानताओं को भी उजागर करता है। कहीं आरक्षण का लाभ मुख्यतः उन महिलाओं तक ही सीमित नहीं रह जाए, जो पहले ही अपेक्षाकृत सशक्त हैं- सवर्ण, शहरी और राजनीतिक रूप से जुड़ी हुई। तब हाशिये के समुदायों की महिलाओं का सशक्तीकरण कैसे होगा?
