लखनऊ, 15 अप्रैल 2026 (यूएनएस)। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती ने बुधवार को राजधानी लखनऊ में आयोजित प्रेस वार्ता में समाजवादी पार्टी पर तीखा हमला बोला। उन्होंने बिना नाम लिए अखिलेश यादव को निशाने पर लेते हुए कहा कि दलितों को भ्रमित करने के लिए विभिन्न राजनीतिक दल दिखावे की राजनीति कर रहे हैं, लेकिन इससे कोई लाभ नहीं होने वाला।
मायावती ने कहा कि कुछ समय से राजनीतिक दल अपने कार्यक्रमों में नीले रंग का इस्तेमाल कर दलित समाज को आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन दलितों पर केवल बसपा के नीले रंग का ही प्रभाव है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि विरोधियों की यह रणनीति कभी सफल नहीं होगी और दलित समाज ऐसे छलावे को भली-भांति समझता है।
दरअसल, मंगलवार को अंबेडकर जयंती के अवसर पर पूरे प्रदेश में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए गए थे। इस दौरान समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने भी कई स्थानों पर आयोजन किए। लखनऊ में अखिलेश यादव नीला गमछा पहनकर बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा पर श्रद्धांजलि देते नजर आए। उन्होंने भंडारे में शामिल होकर आम लोगों के बीच समय भी बिताया।
प्रेस वार्ता में मायावती ने महिला आरक्षण को लेकर केंद्र सरकार के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण का निर्णय स्वागत योग्य है, लेकिन इसमें दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग की महिलाओं के लिए अलग से प्रावधान होना चाहिए। उन्होंने कहा कि बसपा लंबे समय से महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देने की मांग करती रही है।
उन्होंने कांग्रेस पर भी निशाना साधते हुए कहा कि पहले महिला आरक्षण की मांग को नजरअंदाज किया गया, जबकि अब सभी दलों को संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठकर इस महत्वपूर्ण विषय पर एकजुट होना चाहिए। मायावती ने कहा कि महिलाओं की वर्तमान सामाजिक स्थिति को देखते हुए आरक्षण को जल्द से जल्द लागू किया जाना जरूरी है।
उत्तर प्रदेश में दलित मतदाता किसी भी चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। प्रदेश में दलितों की आबादी लगभग 20.7 प्रतिशत (करीब 4.14 करोड़) है और विधानसभा की 84 सीटें उनके लिए आरक्षित हैं। इसके अलावा 120 से अधिक सीटों पर दलित वोट बैंक चुनाव परिणाम को प्रभावित करता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि दलित समाज के भीतर जाटव समुदाय बसपा का मुख्य आधार रहा है, जबकि गैर-जाटव दलितों में विभिन्न दलों के बीच प्रतिस्पर्धा बनी रहती है। यही कारण है कि सभी प्रमुख राजनीतिक दल दलित मतदाताओं को साधने के लिए अलग-अलग रणनीतियां अपना रहे हैं।
आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए प्रदेश की राजनीति में दलित वोट बैंक को लेकर घमासान और तेज होने की संभावना है।
