खेती की नई चुनौतियों पर वैज्ञानिकों ने किया मंथन

लखनऊ, 09 अप्रैल 2026। भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान में आयोजित छठवीं उत्तर प्रदेश कृषि विज्ञान कांग्रेस के दूसरे दिन सात विभिन्न तकनीकी सत्रों का सफल आयोजन किया गया। “विकसित कृषि, विकसित भारत @2047 के लिए कृषि में परिवर्तन” विषय पर केंद्रित इस आयोजन में वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने खेती की नई चुनौतियों और समाधान पर गहन मंथन किया।

तकनीकी सत्रों में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने, पारंपरिक कृषि से आगे बढ़कर कृषि व्यवसाय को अपनाने और युवाओं को नौकरी के बजाय उद्यमिता की ओर प्रेरित करने पर विशेष जोर दिया गया। विशेषज्ञों ने कृषि में मार्केटिंग, वैल्यू एडिशन और बेहतर पैकेजिंग को आवश्यक बताते हुए “खेत एक, फसल अनेक” के सिद्धांत को अपनाने की महत्वपूर्ण संस्तुतियां दीं।

दूसरे दिन आयोजित सत्रों में जलवायु अनुकूल फसलों की किस्मों के विकास, फसलों में जैविक तनाव (रोग, कीट और नेमाटोड) के प्रबंधन, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और फार्म मशीनीकरण जैसे विषयों पर विस्तृत चर्चा हुई। इसके साथ ही शुष्क क्षेत्रों के छोटे किसानों के लिए उन्नत बीज प्रणाली, द्वितीयक कृषि, मूल्य संवर्धन, पोषण और खाद्य सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर भी विशेषज्ञों ने अपने विचार रखे।

विशेषज्ञों ने बताया कि नई पीढ़ी की तकनीकें कृषि को अधिक उत्पादक, सुरक्षित, सटीक और लाभकारी बना सकती हैं। गन्ना आधारित बहु-फसली प्रणाली को अपनाने पर जोर देते हुए कहा गया कि गन्ने के साथ हल्दी, मूंग, काली मिर्च और अजवाइन जैसी अंतः फसलें किसानों की आय बढ़ाने में सहायक हो सकती हैं।

मृदा स्वास्थ्य सुधार के लिए कार्बनिक कार्बन बढ़ाने, अवशेष प्रबंधन और जैव-उर्वरकों पर आधारित समेकित पोषक तत्व प्रबंधन अपनाने की सिफारिश की गई। साथ ही कार्बन क्रेडिट के लाभ के लिए उपयुक्त प्रोटोकॉल विकसित करने और भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप मॉनिटरिंग एवं सत्यापन प्रणाली पर शोध की आवश्यकता जताई गई।

कृषि के साथ पोषण और खाद्य प्रसंस्करण पर भी विशेष ध्यान दिया गया। विशेषज्ञों ने बच्चों में कुपोषण दूर करने के लिए बेबी फूड में गाजर, आम और अमरूद पाउडर के उपयोग की सिफारिश की। इसके अलावा आंवला कैंडी, मैंगो बार और जामुन बार जैसे उत्पादों को पोषण के बेहतर विकल्प के रूप में बढ़ावा देने पर बल दिया गया।

बुंदेलखंड क्षेत्र में करौंदा आधारित प्रसंस्कृत उत्पादों को बढ़ावा देकर किसानों की आय बढ़ाने और फसल नुकसान कम करने का सुझाव दिया गया। साथ ही किनोवा जैसी पौष्टिक फसल के उत्पादन को बढ़ाने, जंगली धान और स्थानीय किस्मों के संरक्षण तथा जीन बैंक प्रबंधन में आधुनिक तकनीकों के उपयोग पर भी जोर दिया गया।

विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच सतत और पुनर्योजी कृषि पद्धतियों को अपनाकर ही भविष्य की खेती को सुरक्षित और लाभकारी बनाया जा सकता है।

Related Post

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *