बेलगावी (कर्नाटक), 5 मार्च । उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने बृहस्पतिवार को कहा कि सनातन धर्म को समय के साथ परखा जा सकता है, लेकिन इसे कभी मिटाया नहीं जा सकता।
एक आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार उन्होंने यह बात बेलगावी जिले के यादुरू स्थित श्री वीरभद्रेश्वर मंदिर में राजगोपुरम के उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में भाग लेते हुए कही।
इस अवसर को आध्यात्मिक पुनरुत्थान और सभ्यता की पुनः पुष्टि का महत्वपूर्ण क्षण बताते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत केवल एक देश नहीं, बल्कि एक जीवंत और प्राचीन सभ्यता है, जिसमें सिंधु घाटी से लेकर कन्याकुमारी तक सांस्कृतिक चेतना का सतत प्रवाह दिखाई देता है।
उन्होंने कहा कि यह वही पवित्र भूमि है जहां वेदों का शाश्वत ज्ञान पहली बार सुना गया और जहां भगवद गीता का गहन संदेश आज भी मानवता को साहस के साथ कर्म करने, सदाचार के साथ जीवन जीने और आस्था के साथ समर्पण करने की प्रेरणा देता है।
राधाकृष्णन ने कहा कि हिंदू चेतना केवल रीति-रिवाजों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक व्यापक पद्धति है। उन्होंने “वसुधैव कुटुम्बकम” की शाश्वत भावना का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की आध्यात्मिक दृष्टि प्रकृति और प्रत्येक व्यक्ति में दिव्यता को देखने का संदेश देती है।
वीर-शैव लिंगायत परंपरा का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि इस परंपरा ने कर्नाटक और पड़ोसी महाराष्ट्र में आध्यात्मिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक और सामाजिक सुधार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि वीर-शैव मठों और मंदिरों ने आस्था, सेवा और सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देने में परिवर्तनकारी योगदान दिया है।
विज्ञप्ति के अनुसार उपराष्ट्रपति ने कर्नाटक के प्रसिद्ध लिंगायत धर्मगुरु और समाज सुधारक शिव योगी श्री कदासिद्धेश्वर स्वामीजी को श्रद्धांजलि भी अर्पित की।
उन्होंने कहा, “सनातन धर्म को समय-समय पर परखा जा सकता है, लेकिन इसे कभी समाप्त नहीं किया जा सकता।”
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘विकास भी, विरासत भी’ के दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए राधाकृष्णन ने कहा कि भारत का विकास और उसकी सांस्कृतिक विरासत साथ-साथ आगे बढ़नी चाहिए।
उन्होंने कहा कि भारत आज प्रौद्योगिकी, अर्थव्यवस्था और वैश्विक प्रभाव के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है और साथ ही अपनी सभ्यता की जड़ों से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।
राजगोपुरम के उद्घाटन को आस्था और परंपरा की निरंतरता का प्रतीक बताते हुए उन्होंने कहा कि पवित्र स्थलों का पुनर्जीवन केवल स्थापत्य कला तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक आत्मविश्वास और आध्यात्मिक जागरूकता को पुनर्जीवित करने का प्रयास भी है।
