वॉशिंगटन। अमेरिकी संसद में ईरान पर हालिया सैन्य हमलों को लेकर राष्ट्रपति की युद्ध संबंधी शक्तियों पर इस सप्ताह महत्वपूर्ण बहस होने की संभावना है। प्रतिनिधि सभा और सीनेट, दोनों सदनों के सांसदों ने ऐसे प्रस्ताव तैयार किए हैं जिनमें यह स्पष्ट करने की मांग की गई है कि विदेश में सैन्य कार्रवाई शुरू करने और उसे जारी रखने के अधिकार की संवैधानिक सीमाएँ क्या हैं।
सूत्रों के अनुसार, ईरान के खिलाफ चल रहे सैन्य अभियान की अवधि, उद्देश्य और संभावित परिणामों को लेकर संसद के भीतर मतभेद उभर आए हैं। कई सांसदों का कहना है कि अभियान पर भारी आर्थिक संसाधन खर्च हो रहे हैं, जबकि इसकी स्पष्ट रणनीतिक रूपरेखा सार्वजनिक रूप से सामने नहीं रखी गई है। जवाबी हमलों में अमेरिकी सैन्य कर्मियों की मौत की खबरों ने भी चिंता को और गहरा कर दिया है।
अमेरिकी संविधान के तहत युद्ध की औपचारिक घोषणा का अधिकार संसद के पास है। सीनेट की इंटेलिजेंस कमेटी के प्रमुख मार्क वार्नर ने कहा कि किसी बड़े सैन्य अभियान से पहले राष्ट्रपति को संसद और जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर कार्यपालिका को असीमित अधिकार नहीं दिए जा सकते।
दूसरी ओर, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थक सांसदों का तर्क है कि बदलते वैश्विक सुरक्षा परिवेश में त्वरित निर्णय लेने की आवश्यकता होती है और राष्ट्रपति को सैन्य कार्रवाई के लिए पर्याप्त अधिकार मिलना चाहिए। उनका कहना है कि क्षेत्रीय स्थिरता और अमेरिकी हितों की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि संसद कोई सीमितीकरण प्रस्ताव पारित भी कर देती है, तो उसे प्रभावी बनाने के लिए राष्ट्रपति के संभावित वीटो को निष्प्रभावी करना आसान नहीं होगा। इसके लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता पड़ेगी, जो वर्तमान राजनीतिक संतुलन को देखते हुए चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।
इस बीच व्हाइट हाउस के अधिकारियों द्वारा सांसदों को बंद-द्वार बैठक में सैन्य अभियान की विस्तृत जानकारी देने की तैयारी की जा रही है। विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह बहस न केवल अमेरिकी विदेश नीति की दिशा तय करेगी, बल्कि राष्ट्रपति और संसद के बीच शक्तियों के संतुलन पर भी दूरगामी प्रभाव डाल सकती है।
